By: Vikash Kumar (Vicky)
भोपाल: मध्य प्रदेश में गरीब और जरूरतमंद परिवारों को मुफ्त इलाज की सुविधा उपलब्ध कराने वाली आयुष्मान भारत योजना के तहत करीब 12 करोड़ रुपये के संदिग्ध मेडिकल क्लेम का मामला सामने आया है। राज्य स्वास्थ्य एजेंसी ने डिजिटल रिकॉर्ड की जांच के दौरान मिले संकेतों के आधार पर प्रदेश के 71 अस्पतालों को जांच के दायरे में लिया है। शुरुआती जांच में मरीजों के इलाज से जुड़े रिकॉर्ड में संभावित अनियमितताओं के संकेत मिले हैं। इनमें मृत व्यक्तियों के नाम पर इलाज दर्ज होने और मरीजों को बिना पर्याप्त चिकित्सकीय जरूरत के आईसीयू में भर्ती दिखाए जाने जैसी आशंकाएं शामिल हैं। यह मामला सामने आने के बाद आयुष्मान योजना के तहत अस्पतालों द्वारा किए जाने वाले दावों की जांच और सरकारी धन के इस्तेमाल को लेकर सवाल उठने लगे हैं। हालांकि, अभी इन सभी अस्पतालों के खिलाफ जांच पूरी होने और आरोपों की पुष्टि होने का इंतजार है। केवल क्लेम संदिग्ध पाए जाने के आधार पर किसी अस्पताल को दोषी नहीं माना जा सकता।

71 अस्पतालों के क्लेम जांच के घेरे में
प्राप्त मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, मध्य प्रदेश के अलग-अलग जिलों में स्थित 71 अस्पतालों के करीब 12 करोड़ रुपये के क्लेम को संदिग्ध श्रेणी में चिह्नित किया गया है। जांच का दायरा भोपाल, इंदौर, ग्वालियर, जबलपुर, उज्जैन, रीवा, सागर, सतना, नीमच, शाजापुर और टीकमगढ़ समेत कई क्षेत्रों तक बताया गया है। अस्पतालों की ओर से आयुष्मान भारत योजना के अंतर्गत मरीजों के उपचार के बाद भुगतान के लिए क्लेम प्रस्तुत किए जाते हैं। इन दावों के आधार पर योजना के निर्धारित नियमों के अनुसार अस्पतालों को भुगतान किया जाता है। यदि क्लेम में दर्ज जानकारी और उपलब्ध रिकॉर्ड के बीच अंतर दिखाई देता है, तो संबंधित मामले की जांच की जा सकती है। राज्य स्वास्थ्य एजेंसी अब यह पता लगाने की प्रक्रिया में है कि संदिग्ध पाए गए क्लेम के पीछे रिकॉर्ड संबंधी त्रुटियां हैं या वास्तविक वित्तीय अनियमितताएं हुई हैं।

मृत व्यक्तियों के नाम पर इलाज दर्ज होने की आशंका
इस मामले में सबसे गंभीर पहलू मृत व्यक्तियों के नाम पर उपचार दर्ज होने की आशंका है। शुरुआती ऑडिट में ऐसे रिकॉर्ड सामने आने की बात कही गई है, जिनमें मरीज की स्थिति और इलाज से संबंधित विवरण की जांच जरूरी मानी गई है। यदि किसी मामले में मृत्यु के बाद उपचार दर्ज किया गया हो, तो यह जांच का महत्वपूर्ण विषय बन सकता है। हालांकि, ऐसे रिकॉर्ड के पीछे तकनीकी गलती, डेटा अपडेट में देरी या जानबूझकर की गई अनियमितता में से क्या कारण है, यह दस्तावेजों के सत्यापन के बाद ही स्पष्ट होगा। इसी तरह, मरीजों को आईसीयू में भर्ती दिखाने से जुड़े क्लेम की भी पड़ताल की जा रही है। जांच में यह देखा जाएगा कि मरीज की वास्तविक चिकित्सकीय स्थिति क्या थी, आईसीयू में भर्ती की जरूरत थी या नहीं और अस्पताल में उपलब्ध उपचार संबंधी रिकॉर्ड क्लेम का समर्थन करते हैं या नहीं।

TMS सॉफ्टवेयर से सामने आए संदिग्ध मामले
आयुष्मान भारत योजना के तहत अस्पतालों के क्लेम की निगरानी में ट्रांजेक्शन मैनेजमेंट सिस्टम यानी TMS की महत्वपूर्ण भूमिका है। इस सिस्टम में मरीज के पंजीकरण, भर्ती, उपचार, डिस्चार्ज और भुगतान के लिए प्रस्तुत दावों से जुड़ी जानकारी दर्ज होती है। डिजिटल रिकॉर्ड का ऑडिट करते समय विभिन्न विवरणों का मिलान किया जाता है। यदि किसी क्लेम में असामान्य पैटर्न या रिकॉर्ड में विसंगति दिखाई देती है, तो उसे आगे की जांच के लिए चिह्नित किया जा सकता है। मध्य प्रदेश में 71 अस्पतालों के क्लेम को जांच के दायरे में लाने के पीछे भी इसी तरह की ऑडिट प्रक्रिया से मिले संकेत बताए जा रहे हैं। अब संबंधित दस्तावेजों और उपचार के रिकॉर्ड की जांच से यह स्पष्ट करने में मदद मिलेगी कि कितने मामलों में वास्तविक गड़बड़ी हुई है।

पहले भी हो चुकी है कार्रवाई
आयुष्मान भारत योजना के तहत अस्पतालों की ओर से किए गए क्लेम और उपचार संबंधी अनियमितताओं को लेकर मध्य प्रदेश में पहले भी कार्रवाई की खबरें सामने आती रही हैं। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, पूर्व की कार्रवाई में भोपाल के 25 अस्पतालों पर कुल 2.11 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया गया था। वहीं, 50 अस्पतालों पर कुल 3.13 करोड़ रुपये की पेनल्टी लगाए जाने तथा कुछ अस्पतालों को ब्लैकलिस्ट या निलंबित किए जाने की जानकारी भी सामने आई थी। इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि योजना के अंतर्गत अस्पतालों के दावों की निगरानी और नियमों के पालन की जांच स्वास्थ्य प्रशासन के लिए महत्वपूर्ण विषय है। हालांकि, पूर्व की कार्रवाई और वर्तमान में जांच के दायरे में आए अस्पतालों के मामलों को अलग-अलग समझना जरूरी है।

मरीजों के हितों की सुरक्षा सबसे जरूरी
आयुष्मान भारत योजना का उद्देश्य पात्र परिवारों को निर्धारित शर्तों के अनुसार कैशलेस इलाज की सुविधा उपलब्ध कराना है। ऐसे में योजना के तहत प्रस्तुत किए जाने वाले क्लेम की पारदर्शी जांच जरूरी है, ताकि सरकारी धन का उपयोग वास्तविक मरीजों के उपचार के लिए हो सके। यदि जांच में किसी अस्पताल द्वारा जानबूझकर गलत जानकारी देकर भुगतान लेने की पुष्टि होती है, तो नियमानुसार वसूली, आर्थिक दंड, योजना के पैनल से निलंबन या अन्य कानूनी कार्रवाई की जा सकती है। दूसरी ओर, यदि किसी मामले में तकनीकी या रिकॉर्ड संबंधी गलती सामने आती है, तो उसका भी तथ्यों के आधार पर निस्तारण किया जाना चाहिए।

जांच के नतीजों पर टिकी नजर
फिलहाल मध्य प्रदेश के 71 अस्पतालों के करीब 12 करोड़ रुपये के संदिग्ध क्लेम की जांच इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। जांच पूरी होने के बाद ही पता चल सकेगा कि कितनी राशि के दावे गलत पाए गए और किन अस्पतालों के खिलाफ कार्रवाई की आवश्यकता है। इस मामले ने एक बार फिर आयुष्मान भारत योजना में डिजिटल निगरानी, अस्पतालों की जवाबदेही और लाभार्थियों के अधिकारों को लेकर चर्चा तेज कर दी है। अब स्वास्थ्य एजेंसी की जांच रिपोर्ट और आगे होने वाली कार्रवाई पर सबकी नजर रहेगी।

नोट: 12 करोड़ रुपये की राशि संदिग्ध क्लेम से संबंधित बताई गई है। इसे प्रमाणित घोटाले की अंतिम राशि नहीं माना जाना चाहिए। अस्पतालों की जिम्मेदारी जांच के निष्कर्षों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही तय होगी।



