By: Vikash Kumar (Vicky)

कोलकाता: पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद निवासी एक व्यक्ति को कथित तौर पर बांग्लादेशी नागरिक होने के संदेह में एक महीने से अधिक समय तक हिरासत में रखे जाने के मामले में कलकत्ता हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के रवैये पर गंभीर सवाल उठाए हैं। न्यायमूर्ति सौगत भट्टाचार्य की अदालत ने सुनवाई के दौरान यह जानना चाहा कि आखिर किस आधार पर व्यक्ति को इतने लंबे समय तक हिरासत में रखा गया और उसे हिरासत या गिरफ्तारी से संबंधित दस्तावेज क्यों नहीं दिए गए।

8 अगस्त से हिरासत में है साहिदुल शेख
मामला मुर्शिदाबाद के डुबापाड़ा गांव के निवासी साहिदुल शेख से जुड़ा है। रिपोर्ट के मुताबिक, रानीनगर पुलिस ने उन्हें 8 अगस्त 2026 को हिरासत में लिया था। इसके बाद से वह विदेशी क्षेत्रीय पंजीकरण अधिकारी यानी FRRO की हिरासत में हैं। मामले में साहिदुल की पत्नी देजीना बीबी ने कलकत्ता हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाते हुए आरोप लगाया कि उनके पति को बांग्लादेशी बताकर गैरकानूनी तरीके से हिरासत में रखा गया है।
याचिकाकर्ता की ओर से अदालत को बताया गया कि साहिदुल भारतीय नागरिक हैं। उनके वकील ने दावा किया कि उनका नाम SIR 2026 की सूची में सत्यापित होकर दर्ज है। इसके अलावा उनके पास वोटर आईडी, पैन कार्ड और आधार कार्ड जैसे दस्तावेज भी हैं। याचिका में यह सवाल उठाया गया कि अगर किसी व्यक्ति की नागरिकता को लेकर संदेह है, तो कानून के तहत प्रक्रिया अपनाते हुए उसे हिरासत में लिए जाने का कारण और संबंधित दस्तावेज उपलब्ध कराए जाने चाहिए।

हाईकोर्ट ने हिरासत की अवधि पर उठाए सवाल
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति सौगत भट्टाचार्य ने राज्य सरकार के वकील से पूछा कि आखिर साहिदुल को 8 अगस्त से हिरासत में क्यों रखा गया है और इस दौरान सत्यापन की प्रक्रिया कितने समय तक चलेगी। अदालत ने यह भी सवाल किया कि जब व्यक्ति को इतने समय से हिरासत में रखा गया है, तब उसके वकील को हिरासत या गिरफ्तारी से संबंधित मेमो उपलब्ध क्यों नहीं कराया गया।
अदालत ने 1970 और 1980 के दशक में भारत-बांग्लादेश सीमा के जरिए हुए बड़े पैमाने पर आवागमन का संदर्भ देते हुए राज्य से पूछा कि क्या इस आधार पर लंबे समय पहले सीमा पार करने वाले हर व्यक्ति के खिलाफ इसी तरह की कार्रवाई शुरू की जाएगी। न्यायमूर्ति ने सुनवाई के दौरान मानवाधिकारों के उल्लंघन को लेकर भी चिंता जाहिर की।

राज्य सरकार ने क्या कहा?
राज्य सरकार की ओर से पेश वकील राज मोहन चट्टोराज ने अदालत के सामने अलग पक्ष रखा। राज्य का दावा है कि साहिदुल ने खुद स्वीकार किया था कि वह बांग्लादेशी नागरिक हैं और कई वर्ष पहले भारत आए थे। सरकार के अनुसार, साहिदुल ने एक मृत स्थानीय निवासी का बेटा होने का दावा किया और इसके बाद ऐसे भारतीय दस्तावेज हासिल किए जो देखने में वास्तविक लगते थे। राज्य ने यह भी दावा किया कि इन्हीं दस्तावेजों के आधार पर उनका नाम SIR 2026 में शामिल हुआ।
राज्य सरकार के मुताबिक, इस पूरे मामले की जांच की जा रही है। सरकार की ओर से यह भी कहा गया कि साहिदुल को FRRO से मिले इनपुट के आधार पर हिरासत में लिया गया था और रानीनगर पुलिस बिना वजह लोगों को हिरासत में नहीं ले रही है। यानी नागरिकता को लेकर जांच और दस्तावेजों की सत्यता की प्रक्रिया अभी राज्य के अनुसार जारी है।

कब और किसके सामने दिया गया कथित बयान?
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के दावे के एक महत्वपूर्ण पहलू पर भी सवाल उठाया। न्यायमूर्ति भट्टाचार्य ने पूछा कि साहिदुल द्वारा कथित तौर पर बांग्लादेशी होने की बात कब और किस अधिकारी के सामने कही गई थी। अदालत के सामने यह स्पष्ट नहीं था कि यह कथित स्वीकारोक्ति पुलिस के सामने हुई या FRRO के समक्ष। इसी संदर्भ में कोर्ट ने सत्यापन की प्रक्रिया की अवधि और उसके आधार पर किसी व्यक्ति को लंबे समय तक हिरासत में रखने पर सवाल उठाए।
अदालत ने यह भी पूछा कि साहिदुल के भारतीय दस्तावेजों को किस आधार पर अवैध या संदिग्ध माना गया। अगर SIR 2026 में उनका नाम कथित तौर पर गलत तरीके से शामिल किया गया है, तो अदालत ने यह सवाल भी उठाया कि ऐसी स्थिति में संबंधित अधिकारी की भूमिका की जांच क्यों नहीं की जानी चाहिए।

हिरासत मेमो देने का निर्देश
सुनवाई के दौरान अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि साहिदुल का हिरासत या गिरफ्तारी मेमो उनके वकील को उपलब्ध कराया जाए। इसके साथ ही रानीनगर थाने के प्रभारी अधिकारी को 15 दिनों के भीतर हलफनामा दाखिल करके यह बताने को कहा गया है कि साहिदुल को किन आधारों पर हिरासत में लिया गया।
इसके अलावा मुर्शिदाबाद के पुलिस अधीक्षक, जो FRRO के तौर पर भी कार्य कर रहे हैं, उन्हें 10 दिनों के भीतर रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया गया है। रिपोर्ट में राज्य की ओर से अब तक उठाए गए कदमों और मामले की स्थिति की जानकारी देने को कहा गया है। मामले की अगली सुनवाई 8 अक्टूबर 2026 को होने की बात रिपोर्टों में कही गई है।

मानवाधिकार और नागरिकता सत्यापन के बीच संतुलन पर जोर
इस मामले में हाईकोर्ट की टिप्पणियां नागरिकता सत्यापन की प्रक्रिया और व्यक्तिगत अधिकारों के बीच संतुलन के सवाल को सामने लाती हैं। एक तरफ राज्य सरकार का कहना है कि साहिदुल की नागरिकता को लेकर गंभीर संदेह है और दस्तावेजों की जांच की जा रही है। दूसरी तरफ साहिदुल की पत्नी और उनके वकील का दावा है कि वह भारतीय नागरिक हैं और उनके पास भारतीय पहचान से जुड़े दस्तावेज मौजूद हैं।
फिलहाल हाईकोर्ट ने साहिदुल की नागरिकता पर अंतिम फैसला नहीं दिया है। अदालत का मौजूदा हस्तक्षेप मुख्य रूप से हिरासत के आधार, प्रक्रिया, दस्तावेजों और राज्य की ओर से की जा रही जांच को लेकर है। आगे की सुनवाई में राज्य की रिपोर्ट और संबंधित अधिकारियों के हलफनामे के आधार पर मामले की स्थिति और स्पष्ट हो सकती है।

