By: Mala Mandal
Chaturmas 2026: सनातन धर्म में चातुर्मास का विशेष धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व माना जाता है। यह चार महीनों की ऐसी पवित्र अवधि होती है, जब भगवान विष्णु योगनिद्रा में चले जाते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार चातुर्मास के दौरान विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन, नए व्यापार की शुरुआत और अन्य मांगलिक कार्य नहीं किए जाते। इस अवधि में भगवान विष्णु की आराधना, व्रत, दान-पुण्य, जप-तप और धार्मिक साधना का विशेष महत्व बताया गया है।

वर्ष 2026 में चातुर्मास की शुरुआत देवशयनी एकादशी से होगी। पंचांग के अनुसार इस वर्ष देवशयनी एकादशी का व्रत 25 जुलाई 2026 को रखा जाएगा। इसी दिन भगवान श्रीहरि विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग की शय्या पर योगनिद्रा में चले जाएंगे और चातुर्मास का शुभारंभ माना जाएगा। इसके बाद चार महीने तक शुभ और मांगलिक कार्यों पर विराम रहेगा।
कब समाप्त होगा चातुर्मास?
चातुर्मास का समापन **देवउठनी (प्रबोधिनी) एकादशी** के दिन होता है। इस दिन भगवान विष्णु योगनिद्रा से जागते हैं और इसके बाद विवाह सहित सभी शुभ एवं मांगलिक कार्य दोबारा शुरू हो जाते हैं। वर्ष 2026 में देवउठनी एकादशी **22 नवंबर 2026** को मनाई जाएगी। इसी दिन से विवाह, गृह प्रवेश, नामकरण, मुंडन और अन्य शुभ कार्यों के लिए फिर से शुभ मुहूर्त मिलने लगेंगे।

चातुर्मास का धार्मिक महत्व
धार्मिक मान्यता के अनुसार आषाढ़ शुक्ल एकादशी के दिन भगवान विष्णु चार महीने के लिए योगनिद्रा में चले जाते हैं। इस दौरान सृष्टि के संचालन की जिम्मेदारी भगवान शिव संभालते हैं। चातुर्मास का समय साधना, आत्मचिंतन, संयम और भक्ति का काल माना जाता है। संत-महात्मा भी इस अवधि में एक स्थान पर रहकर धर्मोपदेश, कथा, कीर्तन और पूजा-पाठ करते हैं।

चातुर्मास में क्यों नहीं किए जाते शुभ कार्य?
सनातन परंपरा में माना जाता है कि जब भगवान विष्णु योगनिद्रा में रहते हैं, तब विवाह, गृह प्रवेश, नए व्यवसाय की शुरुआत, यज्ञोपवीत, मुंडन और अन्य मांगलिक कार्य नहीं किए जाते। इसके पीछे धार्मिक मान्यता यह है कि भगवान विष्णु शुभ कार्यों के प्रमुख देवता हैं, इसलिए उनके विश्राम काल में बड़े शुभ कार्यों को स्थगित रखा जाता है। इसके अलावा वैज्ञानिक दृष्टि से भी यह समय वर्षा ऋतु का होता है। पुराने समय में लगातार बारिश, यात्रा की कठिनाइयों और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के कारण बड़े सामाजिक और धार्मिक आयोजनों से बचा जाता था। यही परंपरा आज भी चली आ रही है।

चातुर्मास में क्या करें?
चातुर्मास के दौरान भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी और भगवान शिव की नियमित पूजा करें।
रोजाना विष्णु सहस्रनाम, श्रीमद्भागवत, भगवद्गीता या रामचरितमानस का पाठ करना शुभ माना जाता है।
जरूरतमंद लोगों को अन्न, वस्त्र और धन का दान करें।
सात्विक भोजन ग्रहण करें और क्रोध, झूठ तथा नकारात्मक विचारों से दूर रहें।
धार्मिक कार्यों, जप-तप और ध्यान में समय बिताएं।

चातुर्मास में किन कार्यों से बचना चाहिए?
विवाह, सगाई, गृह प्रवेश, मुंडन और नए व्यापार की शुरुआत जैसे मांगलिक कार्यों से बचें।
अनावश्यक विवाद और क्रोध से दूर रहें।
तामसिक भोजन और नशे का सेवन न करें।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस अवधि में संयमित जीवनशैली अपनाना शुभ माना जाता है।

चातुर्मास का आध्यात्मिक संदेश
चातुर्मास केवल शुभ कार्यों पर विराम लगाने का समय नहीं है, बल्कि यह आत्मशुद्धि, आध्यात्मिक उन्नति और ईश्वर भक्ति का अवसर भी माना जाता है। इन चार महीनों में व्यक्ति अपने जीवन में अनुशासन, संयम और सकारात्मक बदलाव लाने का प्रयास करता है। यही कारण है कि सनातन धर्म में चातुर्मास का विशेष महत्व बताया गया है।
यह लेख धार्मिक मान्यताओं, पंचांग और उपलब्ध पारंपरिक जानकारियों पर आधारित है। विभिन्न क्षेत्रों और पंचांगों के अनुसार तिथि एवं मुहूर्त में अंतर संभव है। किसी भी धार्मिक अनुष्ठान या शुभ कार्य से पहले अपने स्थानीय पंचांग या योग्य आचार्य से सलाह अवश्य लें।




