By: Mala Mandal
देवघर। जिले की स्वास्थ्य व्यवस्था और सरकारी संसाधनों के रखरखाव को लेकर एक गंभीर मामला सामने आया है। देवघर सदर अस्पताल परिसर स्थित रेड क्रॉस भवन में हजारों कार्टून दवाइयां रखे होने का मामला उजागर हुआ है। हैरानी की बात यह है कि इन कार्टूनों में बड़ी संख्या में दवाइयां एक्सपायर हो चुकी हैं, जबकि कई अन्य दवाइयां एक्सपायर होने की कगार पर हैं। जानकारी के अनुसार, कुछ कार्टूनों में रखी दवाइयों की एक्सपायरी डेट नवंबर 2026 है। यानी आने वाले 11 नवंबर तक बड़ी मात्रा में दवाइयों की उपयोग अवधि समाप्त होने वाली है। इस मामले के सामने आने के बाद स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली, दवाइयों के भंडारण और वितरण व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। एक ओर सरकारी अस्पतालों में मरीजों को कई बार जरूरी दवाइयों के लिए परेशान होना पड़ता है, वहीं दूसरी ओर सदर अस्पताल परिसर में हजारों कार्टून दवाइयों का लंबे समय तक पड़े रहना और उनका एक्सपायर हो जाना व्यवस्था की बड़ी खामी की ओर इशारा करता है।

समय पर वितरण होता तो बच सकती थीं दवाइयां
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब ये दवाइयां मरीजों के इलाज के लिए उपलब्ध कराई गई थीं, तो आखिर इन्हें समय रहते अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों तक क्यों नहीं पहुंचाया गया? क्या संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों को इन दवाइयों के स्टॉक की जानकारी नहीं थी? क्या दवाइयों की एक्सपायरी डेट की नियमित निगरानी नहीं की जा रही थी? यदि समय रहते दवाइयों का वितरण किया जाता तो संभव है कि बड़ी मात्रा में दवाइयां बर्बाद होने से बच जातीं और जरूरतमंद मरीजों को उनका लाभ मिल पाता। सरकारी अस्पतालों में इलाज कराने पहुंचने वाले गरीब और जरूरतमंद मरीजों के लिए मुफ्त दवाइयां किसी बड़ी राहत से कम नहीं होतीं। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को निजी मेडिकल दुकानों से दवाइयां खरीदने में काफी परेशानी होती है। ऐसे में सरकारी स्तर पर उपलब्ध कराई गई दवाइयों का उपयोग मरीजों के इलाज में होना चाहिए। लेकिन यदि यही दवाइयां अस्पताल परिसर के किसी भवन में कार्टूनों में बंद पड़ी रहें और उनकी उपयोग अवधि समाप्त हो जाए, तो यह सरकारी संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल पर गंभीर सवाल खड़ा करता है।

दवाइयों का स्टॉक किसकी जिम्मेदारी?
इस पूरे मामले में यह जानना भी जरूरी है कि रेड क्रॉस भवन में रखी गई इतनी बड़ी मात्रा में दवाइयां कहां से आई थीं। इनकी खरीद या आपूर्ति कब हुई थी? किस अस्पताल या स्वास्थ्य केंद्र के लिए इन दवाइयों का आवंटन किया गया था? स्टॉक में दवाइयों की उपलब्धता के बावजूद उनका वितरण क्यों नहीं किया गया? क्या दवाइयों की मांग और उपलब्धता के बीच कोई समन्वय नहीं था? स्वास्थ्य विभाग में दवाइयों के स्टॉक का रिकॉर्ड रखने, उनकी एक्सपायरी डेट की निगरानी करने और जरूरत के अनुसार उनका वितरण सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों की होती है। इसके बावजूद यदि हजारों कार्टून दवाइयां लंबे समय तक एक ही स्थान पर पड़ी रहें, तो स्टॉक प्रबंधन की व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

सिविल सर्जन ने मांगी रिपोर्ट
मामले को लेकर देवघर के सिविल सर्जन डॉ. शिव प्रसाद मिश्रा ने बताया कि संबंधित स्टोर कीपर से रिपोर्ट मांगी गई है। इसके अलावा स्टॉक इंचार्ज से भी दवाइयों के संबंध में विस्तृत रिपोर्ट उपलब्ध कराने को कहा गया है। रिपोर्ट मिलने के बाद ही दवाइयों के स्टॉक और उनकी पूरी स्थिति स्पष्ट हो पाएगी। सिविल सर्जन के इस बयान के बाद अब सबकी नजर विभागीय रिपोर्ट पर टिकी है। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि रिपोर्ट में कितनी दवाइयों का स्टॉक दर्ज है, कितनी दवाइयां एक्सपायर हो चुकी हैं और कितनी दवाइयों की एक्सपायरी आने वाले दिनों में होने वाली है। साथ ही यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि इन दवाइयों का वितरण किन कारणों से नहीं हो पाया।

सिर्फ रिपोर्ट मांगने से खत्म होगी जवाबदेही?
हालांकि, इस पूरे मामले में केवल रिपोर्ट मांगना ही पर्याप्त नहीं माना जा सकता। जरूरत इस बात की है कि दवाइयों के स्टॉक का भौतिक सत्यापन कराया जाए और प्रत्येक दवा का नाम, मात्रा, बैच नंबर तथा एक्सपायरी डेट सार्वजनिक की जाए। यह भी जांच होनी चाहिए कि दवाइयां कब से रेड क्रॉस भवन में रखी हुई थीं और उनके वितरण में देरी के लिए कौन जिम्मेदार है।

यदि जांच में लापरवाही सामने आती है तो संबंधित जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों की जवाबदेही तय होनी चाहिए। साथ ही एक्सपायर दवाइयों को निर्धारित नियमों के अनुसार सुरक्षित तरीके से नष्ट करने की प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए। एक्सपायर दवाइयों को किसी भी परिस्थिति में मरीजों को वितरित या उपयोग नहीं किया जाना चाहिए।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि देवघर सदर अस्पताल के रेड क्रॉस भवन में हजारों कार्टून दवाइयां आखिर किसकी निगरानी में रखी गई थीं? क्या स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों को इसकी जानकारी नहीं थी या फिर जानकारी होने के बावजूद वितरण को लेकर गंभीरता नहीं दिखाई गई? सरकारी खजाने से खरीदी गई दवाइयों का इस तरह बर्बाद होना आखिर किसकी जिम्मेदारी है?

फिलहाल विभागीय रिपोर्ट का इंतजार है, लेकिन देवघर की जनता यह जानना चाहती है कि मरीजों के इलाज के लिए उपलब्ध कराई गई दवाइयां मरीजों तक पहुंचने के बजाय कार्टूनों में बंद क्यों पड़ी रहीं। इस मामले में निष्पक्ष जांच और जिम्मेदारी तय होना बेहद जरूरी है।




