By: Mala Mandal
देवघर: धार्मिक नगरी देवघर में पण्डा धर्मरक्षिणी सभा द्वारा एक बार फिर सामाजिक और सांस्कृतिक परंपराओं को सहेजते हुए सामूहिक उपनयन संस्कार का आयोजन किया जा रहा है। यह आयोजन न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि सामाजिक सुधार और आर्थिक संतुलन का भी एक सशक्त उदाहरण बनता जा रहा है।

सभा के तत्वावधान में इस वर्ष कुल 10 बच्चों का उपनयन संस्कार संपन्न कराया जाएगा। कार्यक्रम की शुरुआत परंपरागत विधि-विधान के साथ मंगलवार की शाम 7:30 बजे मंडप पूजन से होगी, जबकि मुख्य उपनयन संस्कार बुधवार को दिन में आयोजित किया जाएगा।
परंपरागत विधि से निकली शोभायात्रा
संस्कार से पूर्व सभी 10 ‘बरूआ’ (उपनयन के लिए चयनित बालक) को समाजबाड़ी से पारंपरिक रीति – रिवाज के साथ बाजे – गाजे के साथ निकाला गया। शोभायात्रा में शामिल परिजन और समाज के लोग भक्ति और उत्साह से ओत-प्रोत दिखे। इस दौरान कांसा तेल बाबा पर अर्पित करने की परंपरा निभाई गई और सभी श्रद्धालु बाबा मंदिर पहुंचे, जहां विधिवत पूजा-अर्चना कर बाबा बैद्यनाथ का आशीर्वाद लिया गया।

मंडप पूजन में शामिल होंगे परिजन
शाम को आयोजित होने वाले मंडप पूजन कार्यक्रम में सभी बरूआ के परिजन शामिल होंगे। इस दौरान वैदिक मंत्रोच्चारण के साथ विधिवत पूजा-अर्चना की जाएगी, जो उपनयन संस्कार की एक महत्वपूर्ण कड़ी मानी जाती है।

फिजूल खर्च पर रोक, शिक्षा पर जोर
सभा के वरिष्ठ उपाध्यक्ष चंद्रशेखर खबाडे ने इस आयोजन के पीछे के उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए बताया कि उपनयन संस्कार एक पवित्र और आवश्यक परंपरा है, लेकिन समय के साथ इसमें कई कुरीतियां और अनावश्यक खर्च जुड़ते चले गए हैं। उन्होंने कहा कि आज समाज में उपनयन संस्कार को लेकर दिखावे और खर्च की होड़ बढ़ती जा रही है, जिससे आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है। इसी को ध्यान में रखते हुए सभा ने सामूहिक उपनयन संस्कार की शुरुआत की, ताकि कम खर्च में सभी आवश्यक परंपराओं का निर्वहन किया जा सके।

खबाडे ने आगे कहा कि इस तरह बचाए गए पैसे का उपयोग बच्चों की शिक्षा और उज्ज्वल भविष्य के लिए किया जाना चाहिए। यदि परिवार इस बचत को बच्चों की पढ़ाई में लगाते हैं, तो वे आगे चलकर बेहतर शिक्षा प्राप्त कर समाज और देश के लिए उपयोगी नागरिक बन सकते हैं।
1993 से जारी है परंपरा
पण्डा धर्मरक्षिणी सभा द्वारा सामूहिक उपनयन संस्कार का आयोजन वर्ष 1993 से लगातार किया जा रहा है। हालांकि बीच में कुछ व्यवधान आए थे, लेकिन इसके बावजूद यह परंपरा कायम रही।
कोरोना महामारी के दौरान दो वर्षों तक यह आयोजन स्थगित रहा, लेकिन स्थिति सामान्य होने के बाद इसे फिर से नियमित रूप से शुरू कर दिया गया। वर्तमान में हर वर्ष बड़ी संख्या में परिवार इस आयोजन से जुड़ रहे हैं।

इस वर्ष 10 परिवारों की भागीदारी
इस वर्ष कुल 10 परिवार अपने बच्चों के साथ इस सामूहिक उपनयन संस्कार में भाग ले रहे हैं। सभी बच्चों के लिए समान रूप से धार्मिक विधियों का पालन किया जाएगा।
संस्कार के दौरान यज्ञोपवीत धारण, गुरु दीक्षा, गायत्री मंत्र का उपदेश और अन्य वैदिक परंपराओं का विधिवत निर्वहन किया जाएगा।

धार्मिक और सामाजिक समरसता का संदेश
यह आयोजन न केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित है, बल्कि समाज में समरसता और समानता का भी संदेश देता है। सामूहिक आयोजन के कारण सभी वर्गों के लोग एक साथ जुड़ते हैं, जिससे सामाजिक एकता मजबूत होती है।
साथ ही, यह पहल समाज में फैली अनावश्यक खर्च और दिखावे की प्रवृत्ति पर भी अंकुश लगाने का काम कर रही है।

युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणा
सभा की यह पहल युवा पीढ़ी के लिए भी एक सकारात्मक संदेश है कि परंपराओं का पालन सादगी और सार्थकता के साथ किया जा सकता है।
यदि समाज इस दिशा में आगे बढ़ता है, तो न केवल आर्थिक बचत होगी, बल्कि शिक्षा और विकास के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय सुधार देखने को मिलेगा।

