By: Vikash Kumar (Vicky)
नई दिल्ली: मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी Special Intensive Revision (SIR) को लेकर जारी राजनीतिक और सार्वजनिक बहस के बीच चुनाव आयोग ने बुधवार को एक महत्वपूर्ण प्रेस नोट जारी किया। यह प्रेस नोट उन मीडिया रिपोर्टों के बाद सामने आया है, जिनमें SIR समेत मतदाता सूची से जुड़े कुछ फैसलों को लेकर चुनाव आयोग के भीतर कथित मतभेद और चुनाव आयुक्तों द्वारा सवाल उठाए जाने की बात कही गई थी।
चुनाव आयोग ने अपने बयान में आंतरिक मतभेद या किसी तरह के संस्थागत विभाजन की धारणा को खारिज किया। आयोग ने कहा कि किसी भी बहुसदस्यीय संवैधानिक संस्था में निर्णय लेने की प्रक्रिया के दौरान लिखित टिप्पणियां, सुझाव, तकनीकी इनपुट और सवाल उठाना सामान्य संस्थागत प्रक्रिया का हिस्सा है। आयोग के अनुसार, ऐसे विचार अंतिम निर्णय से पहले प्रक्रिया को बेहतर बनाने और कानूनी तथा प्रशासनिक पहलुओं की जांच के लिए दिए जाते हैं।

SIR को लेकर क्या है विवाद?
Special Intensive Revision यानी SIR का उद्देश्य मतदाता सूची को अपडेट करना और उसमें मौजूद संभावित त्रुटियों को दूर करना है। इस प्रक्रिया के तहत मतदाता रिकॉर्ड की जांच, पात्र मतदाताओं की पुष्टि और अपात्र या संदिग्ध प्रविष्टियों की पहचान जैसे कदम शामिल होते हैं।
हालांकि, SIR की प्रक्रिया को लेकर अलग-अलग स्तरों पर सवाल भी उठाए गए हैं। मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया कि चुनाव आयोग के दो सदस्यों—चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी—ने पिछले महीनों में कुछ फैसलों और प्रक्रियाओं को लेकर लिखित आपत्तियां या टिप्पणियां दर्ज की थीं। रिपोर्टों में यह भी कहा गया कि इनमें मतदाता सूची, फॉर्म में बदलाव, डेटा प्रबंधन और कुछ राज्यों में मतदाता नामों से संबंधित प्रक्रियाएं शामिल थीं।

इन्हीं रिपोर्टों के बाद यह सवाल उठने लगा कि क्या SIR और मतदाता सूची से जुड़े मुद्दों को लेकर चुनाव आयोग के भीतर मतभेद हैं।
चुनाव आयोग ने क्या कहा?
चुनाव आयोग ने अपने प्रेस नोट में कहा कि आयोग एक बहुसदस्यीय संवैधानिक संस्था है और संविधान के अनुच्छेद 324, वैधानिक नियमों तथा स्थापित संस्थागत प्रक्रियाओं के तहत काम करता है। आयोग के अनुसार, लिखित नोट, टिप्पणियां, तकनीकी सुझाव और आंतरिक जांच-पड़ताल व्यवस्था का नियमित हिस्सा हैं।
आयोग ने स्पष्ट किया कि किसी सदस्य द्वारा किसी प्रस्ताव के ड्राफ्ट चरण में सवाल उठाना या सुझाव देना अपने आप में अंतिम निर्णय से असहमति या संस्थागत मतभेद का प्रमाण नहीं माना जा सकता।

आयोग के मुताबिक, सदस्यों की ओर से दिए गए ऑपरेशनल इनपुट का उद्देश्य मतदाताओं के अधिकारों की सुरक्षा और चुनावी प्रक्रिया को और बेहतर बनाना हो सकता है। आयोग ने यह भी कहा कि किसी संस्था में अलग-अलग विचार सामने आना निर्णय लेने की सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा है।
SIR के फैसलों पर आयोग का दावा
चुनाव आयोग ने कहा कि SIR समेत आयोग के प्रमुख निर्णय सभी संबंधित सदस्यों की मंजूरी के साथ लिए गए हैं। आयोग से जुड़े सूत्रों ने भी मीडिया रिपोर्टों के जवाब में कहा कि SIR और अन्य महत्वपूर्ण फैसलों को लेकर तीनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी थी।

इससे पहले सामने आई रिपोर्टों में दावा किया गया था कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने करीब 10 महीने की अवधि में कई मामलों पर आपत्तियां या सवाल दर्ज किए थे। रिपोर्टों में ऐसे मामलों का उल्लेख किया गया जिनका संबंध Form 6, मतदाता डेटा और सॉफ्टवेयर नियंत्रण, मतदाता नामों को हटाने से जुड़ी अपील तथा कुछ पात्र मतदाताओं के नाम जोड़ने जैसी प्रक्रियाओं से था।
हालांकि, चुनाव आयोग का कहना है कि आंतरिक स्तर पर उठाए गए सवालों या सुझावों को अंतिम निर्णय के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। आयोग के अनुसार, अंतिम आदेश और निर्णय निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत ही जारी किए जाते हैं।

राजनीतिक प्रतिक्रिया भी तेज
चुनाव आयोग के इस स्पष्टीकरण के बीच SIR को लेकर राजनीतिक बहस भी तेज है। विपक्षी दलों के नेताओं ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और SIR की प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाए हैं। कुछ नेताओं ने आयोग के भीतर कथित मतभेदों से जुड़ी मीडिया रिपोर्टों का हवाला देते हुए पारदर्शिता की मांग की है।
वहीं, चुनाव आयोग का रुख है कि उसकी आंतरिक निर्णय प्रक्रिया को केवल कुछ चुनिंदा टिप्पणियों या नोट्स के आधार पर नहीं देखा जाना चाहिए। आयोग ने कहा कि उसके फैसलों और प्रशासनिक निर्देशों के पीछे निर्धारित कानूनी प्रक्रिया और संस्थागत व्यवस्था मौजूद है।

SIR में मतदाताओं के लिए क्या महत्वपूर्ण है?
SIR जैसी प्रक्रिया में मतदाताओं के लिए सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि उनका नाम मतदाता सूची में सही तरीके से दर्ज हो। यदि किसी मतदाता को अपने नाम, पते या अन्य विवरण से जुड़ी कोई समस्या दिखाई देती है, तो उसे संबंधित चुनावी प्रक्रिया के तहत उपलब्ध सुधार या आपत्ति दर्ज कराने के विकल्पों की जानकारी लेनी चाहिए।

दिल्ली में चल रही SIR प्रक्रिया को लेकर भी बड़ी संख्या में मतदाताओं को नोटिस जारी किए जाने की रिपोर्ट सामने आई है। सुप्रीम कोर्ट ने हाल में दिल्ली SIR से जुड़े कुछ नोटिसों में इस्तेमाल किए गए ‘logical discrepancy’ जैसे आधारों पर चुनाव आयोग से स्पष्टीकरण मांगा है। अदालत ने मतदाताओं के जवाब देने की प्रक्रिया को सुविधाजनक बनाने के लिए WhatsApp और ईमेल जैसे माध्यमों के इस्तेमाल का सुझाव भी दिया।
क्या है पूरे मामले का सार?
कुल मिलाकर, SIR को लेकर दो अलग-अलग पहलू सामने हैं। पहला, मतदाता सूची को अपडेट और अधिक सटीक बनाने के लिए चुनाव आयोग की ओर से चलाया जा रहा पुनरीक्षण अभियान। दूसरा, इस प्रक्रिया के दौरान आयोग के भीतर सदस्यों की ओर से उठाए गए सवालों और टिप्पणियों को लेकर सामने आई मीडिया रिपोर्टें।

चुनाव आयोग ने अपने ताजा बयान में कहा है कि अलग-अलग टिप्पणियां और सुझाव संस्थागत प्रक्रिया का हिस्सा हैं और इन्हें आयोग के भीतर अंतिम निर्णयों में विभाजन के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। आयोग का कहना है कि SIR समेत महत्वपूर्ण फैसले निर्धारित प्रक्रिया के तहत और सर्वसम्मति से लिए गए हैं।
ऐसे में अब इस पूरे विवाद में चुनाव आयोग के आधिकारिक स्पष्टीकरण और SIR की आगे की प्रक्रिया पर नजर बनी रहेगी। मतदाता सूची से जुड़े किसी भी बदलाव या नोटिस की स्थिति में संबंधित मतदाताओं के लिए आधिकारिक चुनावी चैनलों से जानकारी प्राप्त करना महत्वपूर्ण होगा।

