By: Mala Mandal
हल्द्वानी: उत्तराखंड के हल्द्वानी में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की जनसभा के बाद रामलीला मैदान में कथित ‘शुद्धिकरण हवन’ को लेकर चल रहा विवाद अब कानूनी मोड़ ले चुका है। नैनीताल पुलिस ने इस मामले में पहली FIR दर्ज कर ली है। पुलिस ने यह कार्रवाई अधिवक्ता और कांग्रेस कार्यकर्ता अंजू की शिकायत के आधार पर की है। मामला अज्ञात लोगों के खिलाफ दर्ज किया गया है। FIR में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धाराओं के साथ अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धारा 3(1)(r) भी लगाई गई है। यह विवाद अगस्त में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की हल्द्वानी के रामलीला मैदान में हुई जनसभा के बाद शुरू हुआ था। आरोप है कि जनसभा के बाद कुछ लोगों ने मैदान में हवन कर कथित तौर पर ‘शुद्धिकरण’ किया। घटना सामने आने के बाद कांग्रेस ने इसे जातिगत भेदभाव और दलित समुदाय के अपमान से जोड़ते हुए कार्रवाई की मांग की थी।

अधिवक्ता अंजू की शिकायत पर दर्ज हुई FIR
नैनीताल पुलिस के मुताबिक, हल्द्वानी कोतवाली में अधिवक्ता अंजू की लिखित शिकायत के आधार पर FIR दर्ज की गई है। शिकायत में आरोप लगाया गया कि रामलीला मैदान में किए गए कथित शुद्धिकरण कार्यक्रम के पीछे जातिगत भेदभाव और सामाजिक अपमान की भावना थी। शिकायतकर्ता ने इस मामले में वीडियो सहित कुछ साक्ष्य भी पुलिस के सामने रखे। पुलिस ने फिलहाल किसी व्यक्ति को नामजद नहीं किया है। FIR अज्ञात लोगों के खिलाफ दर्ज की गई है। इसका मतलब है कि अब जांच के दौरान पुलिस घटना में शामिल लोगों की पहचान करने और आरोपों की पुष्टि करने का प्रयास करेगी।

SC-ST एक्ट की धारा भी लगाई गई
इस मामले की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पुलिस ने SC-ST एक्ट की धारा 3(1)(r) के तहत भी केस दर्ज किया है। इसके अलावा BNS की धारा 196 और 299 का उल्लेख FIR में किया गया है। पुलिस अब यह जांच करेगी कि शिकायत में लगाए गए आरोप और उपलब्ध साक्ष्य इन धाराओं के तहत अपराध की आवश्यक शर्तों को पूरा करते हैं या नहीं। SC-ST एक्ट की धारा 3(1)(r) अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के किसी सदस्य को जानबूझकर सार्वजनिक रूप से अपमानित या भयभीत करने से जुड़े मामलों में लागू हो सकती है, यदि कानून में निर्धारित परिस्थितियां पूरी होती हैं। हालांकि किसी FIR में धारा लगना अपने आप आरोपों के साबित होने के बराबर नहीं है। अंतिम निष्कर्ष जांच और न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही सामने आएगा।

पुलिस को मिली थीं करीब 80 शिकायतें
नैनीताल के वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के अनुसार, इस विवाद को लेकर उत्तराखंड के अलग-अलग हिस्सों से पुलिस को लगभग 80 शिकायतें और प्रार्थना पत्र मिले थे। इनमें 19 शिकायतें नैनीताल जिले से संबंधित थीं। शिकायतों और उपलब्ध सामग्री की कानूनी समीक्षा के बाद पुलिस ने अधिवक्ता अंजू की शिकायत पर FIR दर्ज करने का फैसला किया। पुलिस ने मामले की जांच SP Crime डॉ. जगदीश चंद्र को सौंपी है। जांच अधिकारी अब कथित शुद्धिकरण कार्यक्रम से जुड़े वीडियो, बयान और अन्य उपलब्ध साक्ष्यों की जांच करेंगे। साथ ही यह पता लगाने की कोशिश होगी कि कार्यक्रम किसने आयोजित किया और उसमें कौन-कौन लोग शामिल थे।

क्या है पूरा शुद्धिकरण विवाद?
मामला कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की 8 अगस्त को हल्द्वानी के रामलीला मैदान में हुई जनसभा से जुड़ा है। आरोप है कि जनसभा के कुछ समय बाद मैदान में हवन कर कथित तौर पर उसका ‘शुद्धिकरण’ किया गया। इस घटना की तस्वीरें और वीडियो सामने आने के बाद राजनीतिक विवाद शुरू हो गया। कांग्रेस ने इस कथित कृत्य को गंभीर मुद्दा बताते हुए आरोप लगाया कि खड़गे के दलित होने के कारण उनके कार्यक्रम के बाद मैदान का शुद्धिकरण किया गया। पार्टी नेताओं ने इसे अस्पृश्यता और जातिगत भेदभाव से जोड़ते हुए कार्रवाई की मांग की। दूसरी ओर, इस हवन से जुड़े लोगों की ओर से अलग तर्क सामने आया था। उनका कहना था कि रामलीला मैदान धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व वाला स्थान है और राजनीतिक कार्यक्रम के बाद वहां हवन किया गया। इस पक्ष ने कांग्रेस के आरोपों से अलग अपनी व्याख्या पेश की थी।

खड़गे ने भी उठाया था मामला
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने इस घटना को लेकर सार्वजनिक रूप से नाराजगी जताई थी। उन्होंने इसे सामाजिक भेदभाव और लोकतांत्रिक मूल्यों से जोड़ते हुए कार्रवाई की मांग की थी। मामला संसद में भी उठा था। उस समय भाजपा की ओर से भी घटना की जांच कराने और ऐसी गतिविधियों का समर्थन नहीं करने की बात कही गई थी। बाद में कांग्रेस की ओर से लगातार FIR दर्ज करने की मांग की जाती रही। खड़गे ने भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा को पत्र लिखकर भी इस मामले में कार्रवाई की मांग की थी। कांग्रेस का कहना था कि घटना के बावजूद लंबे समय तक FIR दर्ज नहीं होने से उसे निराशा हुई है।

राजनीतिक विवाद ने लिया कानूनी रूप
हल्द्वानी का यह मामला अब केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं रहा। FIR दर्ज होने के बाद पुलिस जांच के जरिए यह तय करने की कोशिश होगी कि कथित शुद्धिकरण कार्यक्रम के पीछे वास्तव में क्या उद्देश्य था और क्या इसमें जातिगत अपमान या भेदभाव से संबंधित अपराध हुआ है। इस बीच मामले में अज्ञात लोगों के खिलाफ FIR दर्ज होने से यह भी साफ है कि पुलिस ने अभी किसी व्यक्ति को आरोपी के तौर पर नामजद नहीं किया है। जांच के दौरान सामने आने वाले साक्ष्यों के आधार पर आगे की कार्रवाई तय की जाएगी।

SC-ST एक्ट के तहत केस को कैसे देखें?
इस मामले में SC-ST एक्ट लगाया जाना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि शिकायतकर्ता ने कथित शुद्धिकरण को केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि अनुसूचित जाति समुदाय से जुड़े व्यक्ति के सामाजिक अपमान और जातिगत भेदभाव के संदर्भ में देखा है। हालांकि, इस पूरे मामले को राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से अलग कानूनी प्रक्रिया के नजरिए से देखना जरूरी है। FIR दर्ज होना जांच की शुरुआत है। पुलिस को यह स्थापित करना होगा कि घटना में शामिल लोगों की भूमिका क्या थी, उनका उद्देश्य क्या था और क्या उपलब्ध साक्ष्य लगाए गए कानूनों के तहत अपराध को साबित करने के लिए पर्याप्त हैं।

अब आगे क्या होगा?
FIR दर्ज होने के बाद पुलिस घटना से जुड़े वीडियो और अन्य साक्ष्यों की जांच करेगी। कार्यक्रम में शामिल लोगों की पहचान की जा सकती है और उनके बयान लिए जा सकते हैं। जांच पूरी होने के बाद पुलिस आगे की कानूनी कार्रवाई करेगी। इस मामले में सबसे अहम बात यही होगी कि जांच निष्पक्ष तरीके से हो और तथ्य सामने आने के आधार पर ही जिम्मेदारी तय की जाए। राजनीतिक रूप से संवेदनशील इस विवाद में कानून और संविधान के तहत मिलने वाले अधिकारों तथा सामाजिक सम्मान से जुड़े पहलुओं को ध्यान में रखना भी महत्वपूर्ण होगा।

हल्द्वानी के रामलीला मैदान में मल्लिकार्जुन खड़गे की जनसभा के बाद हुए कथित ‘शुद्धिकरण हवन’ का विवाद अब FIR तक पहुंच गया है। नैनीताल पुलिस ने अधिवक्ता अंजू की शिकायत पर अज्ञात लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया है। FIR में BNS की धाराओं के साथ SC-ST एक्ट की धारा 3(1)(r) भी लगाई गई है।
अब इस मामले की असली तस्वीर पुलिस जांच के बाद सामने आएगी। जांच में यह तय होगा कि कथित शुद्धिकरण कार्यक्रम में कौन शामिल था, उसका उद्देश्य क्या था और क्या लगाए गए आरोप कानूनी रूप से साबित होते हैं। फिलहाल FIR को मामले में कार्रवाई की शुरुआत के तौर पर देखा जाना चाहिए, न कि आरोपों के अंतिम रूप से साबित होने के तौर पर।
