By: Vikash Kumar Raut (Vicky)
स्टडी ने क्यों बढ़ाई पैरेंट्स की चिंता
Autism In Children: बच्चों में बढ़ते स्क्रीन टाइम को लेकर एक चौंकाने वाली स्टडी सामने आई है, जिसने पैरेंट्स की चिंता को और बढ़ा दिया है। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान यानी एम्स की इस नई रिसर्च में यह संकेत मिला है कि कम उम्र में बच्चों को मोबाइल, टीवी या अन्य डिजिटल स्क्रीन के ज्यादा संपर्क में रखने से ऑटिज्म का खतरा बढ़ सकता है। खासकर 1 साल से कम उम्र के बच्चों में यह खतरा तेजी से बढ़ता देखा गया है।

कम उम्र में स्क्रीन एक्सपोजर का असर
स्टडी के अनुसार, जिन बच्चों को बहुत छोटी उम्र से ही स्क्रीन दिखाना शुरू कर दिया जाता है और उनका स्क्रीन टाइम ज्यादा होता है, उनमें 3 साल की उम्र तक ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर यानी ASD के लक्षण ज्यादा देखने को मिलते हैं। यह स्थिति बच्चों के मानसिक विकास और सामाजिक व्यवहार पर गहरा असर डाल सकती है। डॉक्टर्स का कहना है कि यह आदत बच्चों के ब्रेन डेवलपमेंट को प्रभावित करती है।

डॉक्टरों ने क्या बताया
एम्स के बाल रोग विभाग की प्रोफेसर डॉक्टर शेफाली गुलाटी के मुताबिक कई रिसर्च और मेटा-एनालिसिस में यह पाया गया है कि स्क्रीन टाइम और ऑटिज्म के बीच गहरा संबंध हो सकता है। खासतौर पर ऐसे बच्चे जिनका स्क्रीन टाइम जल्दी शुरू हो जाता है, उनमें ऑटिज्म के लक्षण अधिक दिखाई देते हैं। स्टडी में यह भी सामने आया कि 3 साल तक के लड़कों में यह खतरा ज्यादा पाया गया, हालांकि लड़कियों में भी इसके कुछ संकेत देखे गए हैं।

जितना ज्यादा स्क्रीन टाइम, उतना बढ़ता जोखिम
रिपोर्ट के मुताबिक, जितनी जल्दी और जितनी ज्यादा देर तक बच्चों को स्क्रीन के संपर्क में रखा जाता है, उतना ही ऑटिज्म से जुड़ा जोखिम बढ़ता है। यही वजह है कि विशेषज्ञ लगातार पैरेंट्स को बच्चों का स्क्रीन टाइम सीमित करने की सलाह दे रहे हैं। बच्चों के विकास के शुरुआती साल बेहद महत्वपूर्ण होते हैं और इस दौरान डिजिटल एक्सपोजर को नियंत्रित रखना जरूरी है।

भारत और अंतरराष्ट्रीय गाइडलाइंस क्या कहती हैं
बच्चों के स्क्रीन टाइम को लेकर भारत और दुनिया भर में स्पष्ट गाइडलाइंस जारी की गई हैं। अमेरिकन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स और इंडियन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स के अनुसार, 18 महीने से कम उम्र के बच्चों को स्क्रीन से पूरी तरह दूर रखना चाहिए। 18 महीने से 6 साल तक के बच्चों के लिए सीमित और मॉनिटर किए गए स्क्रीन टाइम की सलाह दी जाती है। वहीं 7 साल से ऊपर के बच्चों के लिए अधिकतम 2 घंटे का स्क्रीन टाइम सुरक्षित माना गया है।

पैरेंट्स के लिए जरूरी सलाह
विशेषज्ञों का कहना है कि बच्चों के साथ ज्यादा से ज्यादा बातचीत करना उनके मानसिक और सामाजिक विकास के लिए बेहद जरूरी है। अगर आप बच्चे को स्क्रीन दिखा रहे हैं तो यह सुनिश्चित करें कि वह कंटेंट उसकी उम्र और विकास के हिसाब से सही हो। साथ ही बच्चों को आउटडोर एक्टिविटी, किताबें और परिवार के साथ समय बिताने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए।

क्या है ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (ASD)
ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर एक जटिल न्यूरोडेवलपमेंटल स्थिति है, जिसमें बच्चों के व्यवहार, कम्युनिकेशन और सामाजिक संपर्क में अंतर देखा जाता है। कई मामलों में इसके लक्षण देर से समझ आते हैं, लेकिन कुछ बच्चों में 12 से 18 महीने के बीच ही संकेत दिखने लगते हैं। सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन के 2025 के आंकड़ों के अनुसार, हर 31 में से 1 व्यक्ति में ASD पाया जाता है।

क्यों जरूरी है समय रहते जागरूकता
आज के डिजिटल युग में बच्चों को स्क्रीन से पूरी तरह दूर रखना मुश्किल हो सकता है, लेकिन संतुलन बनाना बेहद जरूरी है। पैरेंट्स को चाहिए कि वे बच्चों के स्क्रीन टाइम को सीमित करें और उनकी एक्टिविटी पर नजर रखें। सही समय पर उठाया गया कदम बच्चों के भविष्य को सुरक्षित बना सकता है।
यह जानकारी विभिन्न रिसर्च और मेडिकल रिपोर्ट्स पर आधारित है। यह किसी भी प्रकार की चिकित्सीय सलाह का विकल्प नहीं है। बच्चों के स्वास्थ्य से जुड़ी किसी भी समस्या के लिए डॉक्टर या विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें।

