By: Mala Mandal
नींद में अचानक कुछ बोलना, बड़बड़ाना या आधी-अधूरी बातें करना आपने अपने आसपास किसी न किसी व्यक्ति में जरूर देखा होगा। कई बार व्यक्ति सोते हुए अपना नाम पुकारता है, किसी से बातचीत करता हुआ लगता है या फिर ऐसी बातें बोल देता है जिनका जागने के बाद उसे बिल्कुल याद नहीं रहता। इसे आम बोलचाल में नींद में बड़बड़ाना कहा जाता है। लेकिन आखिर ऐसा क्यों होता है? क्या नींद में बोलने का संबंध सपनों से है या उस समय दिमाग के अंदर कोई अलग प्रक्रिया चल रही होती है? वैज्ञानिक भाषा में नींद के दौरान बोलने की इस स्थिति को ‘स्लीप टॉकिंग’ या ‘सोमनिलोकी’ कहा जाता है। यह नींद से जुड़ी एक सामान्य घटना हो सकती है और यह बच्चों से लेकर वयस्कों तक किसी को भी हो सकती है। अधिकतर मामलों में व्यक्ति को खुद पता भी नहीं चलता कि वह नींद में बोल रहा था।

नींद में बड़बड़ाने के दौरान दिमाग में क्या होता है?
जब हम सोते हैं तो हमारा दिमाग पूरी तरह बंद नहीं होता। नींद के दौरान भी मस्तिष्क में अलग-अलग तरह की गतिविधियां चलती रहती हैं। नींद कई चरणों में होती है और इन चरणों के दौरान दिमाग की सक्रियता बदलती रहती है। इसी दौरान कभी-कभी मस्तिष्क के वे हिस्से भी सक्रिय हो सकते हैं जो भाषा, भावनाओं और यादों से जुड़े होते हैं। यही वजह है कि कुछ लोगों के मुंह से नींद में शब्द या वाक्य निकल सकते हैं। व्यक्ति की आवाज स्पष्ट भी हो सकती है और कई बार केवल अस्पष्ट आवाज या बड़बड़ाहट सुनाई देती है।

क्या नींद में बोलना सपने की वजह से होता है?
हर बार ऐसा नहीं होता। नींद में बोलना और सपने देखना एक-दूसरे से जुड़े हो सकते हैं, लेकिन दोनों को एक ही चीज नहीं माना जाता। खासकर REM नींद के दौरान सपने अधिक जीवंत हो सकते हैं। इस अवस्था में मस्तिष्क काफी सक्रिय रहता है। हालांकि नींद में बोली गई हर बात को व्यक्ति के सपने का सीधा संवाद मानना सही नहीं होगा। कई बार व्यक्ति बिना किसी स्पष्ट सपने को याद किए भी नींद में बोल सकता है।

सोते समय दिमाग में चलती रहती हैं यादें और भावनाएं
दिनभर हमारे दिमाग में कई तरह की बातें, अनुभव, चिंताएं और भावनाएं जमा होती रहती हैं। नींद के दौरान मस्तिष्क इन अनुभवों को व्यवस्थित करने और यादों को प्रोसेस करने का काम करता है। इसी प्रक्रिया के दौरान कभी-कभी दिन में हुई किसी घटना से जुड़े शब्द या भावनाएं नींद में बोलने के रूप में सामने आ सकती हैं। उदाहरण के लिए, अगर किसी व्यक्ति ने दिनभर किसी महत्वपूर्ण मीटिंग, परीक्षा, काम या पारिवारिक विषय के बारे में ज्यादा सोचा है, तो संभव है कि उससे जुड़ी बातें उसके सपनों या नींद के दौरान बोलने में दिखाई दें। हालांकि हर व्यक्ति में इसका अनुभव अलग हो सकता है।

तनाव और चिंता भी बढ़ा सकते हैं नींद में बोलने की संभावना
अगर कोई व्यक्ति लंबे समय से तनाव, चिंता या भावनात्मक दबाव में है तो उसकी नींद प्रभावित हो सकती है। नींद का बार-बार टूटना या नींद का पैटर्न बिगड़ना कुछ लोगों में नींद के दौरान बोलने जैसी घटनाओं को बढ़ा सकता है। इसलिए अगर किसी व्यक्ति को कुछ समय से नींद में ज्यादा बोलने की शिकायत हो रही है, तो उसकी नींद की गुणवत्ता, तनाव और रोजमर्रा की दिनचर्या पर भी ध्यान देना जरूरी है।

बच्चों में नींद में बोलना क्यों आम है?
बच्चों में नींद के दौरान बोलना अपेक्षाकृत सामान्य देखा जाता है। बचपन में मस्तिष्क और नींद का पैटर्न लगातार विकसित हो रहा होता है। कई बच्चे नींद में बातें करते हैं, हंसते हैं, रोते हैं या अचानक कुछ शब्द बोल देते हैं। ज्यादातर मामलों में बच्चे को इसकी जानकारी नहीं होती और सुबह उठने के बाद उसे पिछली रात की घटना याद भी नहीं रहती। अगर बच्चा दिन में पूरी तरह सामान्य है और नींद से जुड़ी कोई दूसरी परेशानी नहीं है, तो केवल नींद में बोलना आमतौर पर चिंता का कारण नहीं माना जाता।

क्या नींद में बोली गई बातें सच होती हैं?
यह एक आम गलतफहमी है कि व्यक्ति नींद में हमेशा अपने मन की सच्ची बातें बोलता है। वैज्ञानिक दृष्टि से ऐसा कोई सामान्य नियम नहीं है। नींद में बोले गए शब्द सपने, यादों, कल्पना, दिनभर की घटनाओं या अस्पष्ट मानसिक गतिविधियों से जुड़े हो सकते हैं। इसलिए किसी व्यक्ति की नींद में कही गई बातों को उसकी वास्तविक सोच, इरादे या किसी छिपे हुए रहस्य का प्रमाण मानना सही नहीं है।

क्या नींद में बोलने का इलाज जरूरी है?
अगर व्यक्ति कभी-कभार नींद में बोलता है और इससे उसकी नींद या दैनिक जीवन प्रभावित नहीं होता, तो आमतौर पर किसी विशेष उपचार की जरूरत नहीं होती। पर्याप्त नींद लेना, नियमित सोने-जागने का समय बनाए रखना और तनाव कम करने की कोशिश करना नींद की गुणवत्ता के लिए मददगार हो सकता है। लेकिन अगर नींद में बोलने की समस्या बहुत ज्यादा बढ़ जाए या इसके साथ नींद में चिल्लाना, हिंसक हरकतें करना, बार-बार उठना, चलना, सांस लेने में परेशानी या दिनभर अत्यधिक नींद आना जैसी समस्याएं भी हों, तो डॉक्टर या स्लीप स्पेशलिस्ट से सलाह लेना उचित है।

कब डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए?
अगर नींद में बोलना अचानक शुरू हुआ है और लगातार बढ़ रहा है, तो इसके पीछे नींद से जुड़ी दूसरी समस्या भी हो सकती है। खासकर जब व्यक्ति नींद में खुद को या किसी दूसरे को चोट पहुंचाने जैसी हरकत करे, बहुत ज्यादा बेचैनी हो या दिन के समय काम करने में परेशानी होने लगे, तब विशेषज्ञ की सलाह लेना जरूरी हो सकता है। डॉक्टर व्यक्ति की नींद का पैटर्न, दवाओं, तनाव, स्वास्थ्य संबंधी अन्य समस्याओं और लक्षणों को देखकर आगे की जांच की सलाह दे सकते हैं।
बेहतर नींद के लिए अपनाएं ये आसान आदतें
अच्छी नींद के लिए रोजाना लगभग एक ही समय पर सोने और जागने की कोशिश करें। रात में सोने से पहले मोबाइल और अन्य स्क्रीन का इस्तेमाल कम करें। शाम के बाद अत्यधिक कैफीन लेने से बचें और सोने की जगह को शांत तथा आरामदायक रखें। दिनभर पर्याप्त शारीरिक गतिविधि करना और तनाव कम करने के लिए रिलैक्सेशन तकनीक अपनाना भी नींद की गुणवत्ता सुधारने में मदद कर सकता है।
नींद में बड़बड़ाना यानी स्लीप टॉकिंग कई लोगों में होने वाली सामान्य नींद संबंधी घटना है। इसके दौरान मस्तिष्क पूरी तरह निष्क्रिय नहीं होता, बल्कि नींद के अलग-अलग चरणों में उसकी गतिविधियां जारी रहती हैं। सपने, यादें, भावनाएं, तनाव और नींद के पैटर्न जैसे कई कारक इसके पीछे भूमिका निभा सकते हैं। हालांकि नींद में कही गई बातों को किसी व्यक्ति के वास्तविक विचारों या रहस्यों का सीधा प्रमाण नहीं माना जाना चाहिए।
अगर नींद में बोलने के साथ असामान्य हरकतें, सांस लेने में दिक्कत, चोट लगने का खतरा या दिन में अत्यधिक नींद जैसी समस्या दिखाई दे, तो विशेषज्ञ से सलाह लेना बेहतर है।
यह लेख सामान्य स्वास्थ्य और वैज्ञानिक जानकारी के उद्देश्य से तैयार किया गया है। नींद में बोलना कई लोगों में सामान्य घटना हो सकती है, लेकिन हर व्यक्ति की स्थिति अलग होती है। लगातार या गंभीर लक्षण दिखाई देने पर स्वयं इलाज करने के बजाय योग्य डॉक्टर या स्लीप स्पेशलिस्ट से सलाह लें।

