By: Vikash Kumar (Vicky)
प्रयागराज में आयोजित चल रहे माघ मेले (Magh Mela) के दौरान प्रशासन और धार्मिक संतों के बीच बड़ा विवाद उभर आया है। मेला प्रशासन ने ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य के तौर पर प्रसिद्ध स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को एक नोटिस जारी किया है, जिसमें उनसे यह सबूत देने को कहा गया है कि वे ही असली शंकराचार्य हैं। प्रशासन ने उन्हें 24 घंटे के भीतर अपने पद का प्रमाण प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं।

यह नोटिस 19 जनवरी की रात में दिया गया था और तब से लेकर अब तक स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद तीन दिनों से धरने पर बैठे हैं, जिसका विवाद धार्मिक व प्रशासनिक दोनों स्तरों पर तूल पकड़ चुका है।
प्रशासन का सबूत मांगने का कारण
प्रशासन ने नोटिस में कहा है कि वे जिस ‘शंकराचार्य’ उपाधि का उपयोग कर रहे हैं, वह सुप्रीम कोर्ट में लंबित एक अपील (3010/2020 और संबंधित मामले) के कारण विवादित है। शीर्ष अदालत ने कहा है कि जब तक मामला सुलझ नहीं जाता है, तब तक किसी को भी ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य के रूप में शासित/स्थापित नहीं किया जा सकता।
नोटिस में यह भी स्पष्ट किया गया है कि अविमुक्तेश्वरानंद ने अपने शिविर के बोर्ड पर स्वयं को ‘शंकराचार्य’ के रूप में प्रदर्शित किया है, जो कोर्ट के आदेश की अवहेलना दिखाता है। प्रशासन ने इसे गंभीर मामला मानते हुए स्पष्ट जवाब मांगा है कि वे इस उपाधि का उपयोग किस अधिकार/प्रमाण के आधार पर कर रहे हैं।
संता का धरना: तीन दिनों से जारी विरोध प्रदर्शन
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद इस नोटिस के बाद से ही धरने पर बैठे हैं। वे प्रशासन से माफी और नोटिस वापस लेने की मांग कर रहे हैं। उनके अनुसार, अगर प्रशासन उनसे माफी नहीं मांगेगा, तो वे आश्रम के अंदर प्रवेश भी नहीं करेंगे।
धरने के चलते माघ मेला क्षेत्र में भीड़ और प्रशासन के बीच तनाव बढ़ता जा रहा है, जबकि संतों का समाज भी इस मुद्दे पर प्रतिक्रिया दे रहा है और विवाद को धार्मिक स्वतंत्रता तथा परंपराओं के सम्मान से जोड़कर देखा जा रहा है।

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का तीखा जवाब
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने प्रशासन के नोटिस का जवाब देते हुए कहा है कि “क्या अब प्रशासन तय करेगा कि कौन शंकराचार्य है और कौन नहीं?” उन्होंने साफ कहा कि भारत के राष्ट्रपति को भी यह अधिकार नहीं है कि वह शंकराचार्य तय करें। उनके अनुसार यह निर्णय केवल धार्मिक परंपरा और अन्य पीठों के संतों द्वारा ही निश्चय किया जा सकता है।
स्वामी जी ने अपने बयान में यह भी कहा कि दो अलग-अलग पीठ उन्हें शंकराचार्य मानती हैं और पिछले माघ मेले में उन्होंने संगम स्नान भी उनके साथ किया है। इसलिए वे इस सबूत की मांग को प्रशासन की अतिक्रमण और धार्मिक मान्यताओं पर हमला मानते हैं।
कानूनी विवाद और धार्मिक परंपरा
विशेषज्ञों के अनुसार शंकराचार्य की उपाधि का विवाद कोई नया मुद्दा नहीं है। यह लंबा कानूनी संघर्ष और परंपरा आधारित विवाद है, जो दशकों से चला आ रहा है, और कई बार यह अदालतों तक पहुंच चुका है। 1941 के बाद से शंकराचार्य के पद पर नियुक्ति और वैधता को लेकर विवाद और कानूनी अड़चनें लगातार सामने आती रही हैं।
माघ मेले का प्राधिकरण और प्रशासन इस विवाद को शांति एवं सार्वजनिक व्यवस्था की दृष्टि से गंभीर मामला मान रहा है, खासकर मौनी अमावस्या जैसे तीर्थ स्नान के दौरान सुरक्षा और भीड़ नियंत्रण के मुद्दों को देखते हुए।
प्रशासन का पक्ष
प्रशासन का कहना है कि सभी श्रद्धालुओं और संतों के साथ समान व्यवहार किया जाएगा और नियमों का पालन सुनिश्चित किया जाएगा। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि कोई व्यक्ति विशेष को विशेष वीआईपी सुविधाएं नहीं दी जा रही हैं, जिससे सुरक्षा व सार्वजनिक व्यवस्था बनी रहे।

समर्थन भी बढ़ा: संत समाज और प्रतिक्रियाएँ
हरिद्वार और अन्य स्थानों पर भी साधु-संतों ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के समर्थन में प्रदर्शन किया है, जिसमें उन्होंने प्रशासन और राज्य सरकार से निष्पक्ष निर्णय की मांग की है।
इसके साथ ही उत्तराखंड के मुख्यमंत्री और विभिन्न राजनैतिक तथा सामाजिक व्यक्तित्वों ने भी विवाद पर प्रतिक्रिया दी है, और धार्मिक राजनीति को त्यागने की अपील की है ताकि समस्या जल्द सुलझ सके।
क्या आगे क्या होगा?
जैसे ही 24 घंटे की समय सीमा समाप्त होगी, प्रशासन जवाब के आधार पर आगे की कार्रवाई पर विचार करेगा। यह मामला केवल एक प्रशासनिक आदेश का विरोध नहीं बल्कि धार्मिक उपाधि, परंपरा और कानून के गहरे अंतर्संबंधों को उजागर करता है, जो आने वाले समय में और अधिक चर्चा का विषय बनेगा।

