By: Vikash Kumar Raut (Vicky)
देश में चीनी की बढ़ती कीमतों को लेकर राजनीतिक घमासान तेज हो गया है। त्योहारी सीजन से ठीक पहले चीनी के दाम में तेजी ने आम लोगों के साथ-साथ सरकार की भी चिंता बढ़ा दी है। इसी बीच केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद जोशी ने चीनी की उपलब्धता और बढ़ती कीमतों को लेकर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने साफ कहा है कि देश में चीनी की कोई वास्तविक कमी नहीं है और सरकार के पास पर्याप्त अतिरिक्त स्टॉक मौजूद है। हालांकि, उत्पादन में कमी के पीछे उन्होंने गन्ने की फसल में फैली रेड रॉट बीमारी और अल नीनो जैसी मौसमी परिस्थितियों को प्रमुख कारण बताया है।

चीनी की कीमतों पर क्या बोले प्रह्लाद जोशी?
केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद जोशी के मुताबिक भारत में चीनी की सालाना जरूरत करीब 280 लाख टन है। इसके मुकाबले मौजूदा समय में देश के पास 20 से 25 लाख टन से ज्यादा अतिरिक्त चीनी का स्टॉक मौजूद है। ऐसे में सरकार का कहना है कि देश में चीनी की ऐसी कमी नहीं है, जिससे बाजार में आपूर्ति पूरी तरह प्रभावित हो जाए। हालांकि, चीनी की खुदरा कीमतों में हाल के दिनों में तेज बढ़ोतरी जरूर देखने को मिली है। उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक 20 जुलाई को चीनी का औसत खुदरा भाव करीब 48.18 रुपये प्रति किलो था, जो 20 अगस्त तक बढ़कर 55.70 रुपये प्रति किलो हो गया। यानी करीब एक महीने में कीमतों में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है।

रेड रॉट बीमारी ने घटाया गन्ने का उत्पादन
सरकार ने चीनी की कीमतों में बढ़ोतरी के पीछे जिन दो प्रमुख कारणों का जिक्र किया है, उनमें पहला है रेड रॉट बीमारी। यह गन्ने की फसल को प्रभावित करने वाली गंभीर बीमारी है। इसके कारण गन्ने की पैदावार और गुणवत्ता दोनों पर असर पड़ सकता है। गन्ने के उत्पादन में कमी का सीधा प्रभाव चीनी मिलों के लिए उपलब्ध कच्चे माल पर पड़ता है और अंततः चीनी उत्पादन प्रभावित हो सकता है। प्रह्लाद जोशी ने कहा कि रेड रॉट का प्रकोप अप्रत्याशित था और इसके कारण कृषि उत्पादन प्रभावित हुआ। सरकार के मुताबिक इसका असर सिर्फ भारत तक सीमित नहीं रहा, बल्कि वैश्विक कृषि उत्पादन पर भी इसका प्रभाव पड़ा है।

अल नीनो का भी असर
चीनी की कीमतों को लेकर सरकार ने दूसरा बड़ा कारण अल नीनो को बताया है। अल नीनो की वजह से मौसम के पैटर्न में बदलाव होता है, जिसका असर तापमान, बारिश और कृषि परिस्थितियों पर पड़ सकता है। गन्ने जैसी पानी पर निर्भर फसल के लिए मौसम में प्रतिकूल बदलाव उत्पादन को प्रभावित कर सकता है। सरकार का तर्क है कि रेड रॉट और अल नीनो के संयुक्त प्रभाव से कृषि उत्पादन में कमी आई और इसका असर चीनी उत्पादन पर भी पड़ा। यही वजह है कि सरकार को त्योहारी सीजन से पहले बाजार में पर्याप्त आपूर्ति बनाए रखने के लिए अतिरिक्त कदम उठाने पड़ रहे हैं।
फिर चीनी के दाम इतने क्यों बढ़े?
यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सरकार एक तरफ पर्याप्त स्टॉक होने की बात कह रही है, जबकि दूसरी तरफ बाजार में कीमतें लगातार ऊपर गई हैं। इसकी एक वजह आने वाला त्योहारी सीजन भी है। अगस्त से नवंबर के बीच गणेश चतुर्थी, दशहरा और दिवाली जैसे बड़े त्योहार आते हैं। इस दौरान मिठाइयों और अन्य खाद्य पदार्थों की मांग बढ़ने के कारण चीनी की खपत भी बढ़ती है। बाजार में भविष्य की मांग को लेकर बनी चिंता भी कीमतों पर दबाव डाल सकती है। यही कारण है कि सरकार ने आपूर्ति को लेकर पहले से कदम उठाना शुरू कर दिया है।

सरकार ने लिया आयात का फैसला
बढ़ती कीमतों पर नियंत्रण और बाजार में पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए केंद्र सरकार ने कच्ची चीनी के अस्थायी आयात की अनुमति दी है। रिपोर्टों के मुताबिक करीब 10 लाख टन कच्ची चीनी का शुल्क-मुक्त आयात किया जा सकता है। सरकार का उद्देश्य घरेलू बाजार में अतिरिक्त आपूर्ति उपलब्ध कराकर कीमतों पर दबाव कम करना है। सहकारी चीनी मिलों की संस्था NFCSF के मुताबिक ब्राजील से चीनी की कुछ खेप 15 अक्टूबर से पहले भारत पहुंच सकती है। हालांकि, कितनी मात्रा में चीनी उस समय तक देश में पहुंचेगी, इसका सटीक अनुमान लगाना अभी मुश्किल है। ब्राजील से भारत तक चीनी पहुंचने में सामान्य तौर पर करीब 40 से 45 दिन लग सकते हैं।

विपक्ष ने उठाए अलग सवाल
चीनी की कीमतों को लेकर विपक्ष सरकार के तर्क से पूरी तरह सहमत नहीं है। कांग्रेस की ओर से चीनी उत्पादन और एथेनॉल नीति को लेकर सवाल उठाए गए हैं। विपक्ष का तर्क है कि गन्ने का एक हिस्सा एथेनॉल उत्पादन की ओर जाने से चीनी के लिए उपलब्ध गन्ने पर असर पड़ सकता है। हालिया रिपोर्टों के मुताबिक वित्त वर्ष 2025-26 में लगभग 30 से 35 लाख टन चीनी को एथेनॉल उत्पादन की ओर डायवर्ट किया गया था। विपक्ष इस पहलू को भी चीनी की कीमतों से जोड़कर सरकार से नीति की समीक्षा की मांग कर रहा है।

जमाखोरी पर भी सरकार की नजर
चीनी की बढ़ती कीमतों के बीच सरकार ने बाजार में जमाखोरी रोकने के लिए भी कदम उठाए हैं। केंद्र ने थोक उपभोक्ताओं के लिए स्टॉक रखने की सीमा को लेकर सख्ती की है। एक रिपोर्ट के अनुसार 1 सितंबर से 30 नवंबर 2026 के बीच 10 मीट्रिक टन से अधिक मासिक खपत वाले थोक उपभोक्ताओं को सीमित अवधि का स्टॉक रखने की अनुमति होगी। इससे बाजार में कृत्रिम कमी पैदा करने की कोशिशों पर रोक लगाने का उद्देश्य है।

आम आदमी के लिए क्या मायने?
चीनी की कीमत बढ़ने का सीधा असर घरेलू बजट पर पड़ता है। इसके अलावा मिठाई, बेकरी, पेय पदार्थ और चीनी का इस्तेमाल करने वाले दूसरे खाद्य उत्पाद भी महंगे हो सकते हैं। खासकर त्योहारी सीजन में जब चीनी की मांग बढ़ती है, तब कीमतों में और तेजी आम उपभोक्ता के लिए परेशानी बढ़ा सकती है। सरकार का दावा है कि पर्याप्त स्टॉक और आयात जैसे उपायों से बाजार में आपूर्ति को मजबूत किया जाएगा। अब बड़ा सवाल यह है कि इन कदमों का असर खुदरा बाजार में कितनी जल्दी दिखाई देता है।
कुल मिलाकर चीनी की बढ़ती कीमतों पर सरकार और विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है। सरकार ने रेड रॉट बीमारी और अल नीनो को उत्पादन में कमी की प्रमुख वजह बताया है और साथ ही दावा किया है कि देश में जरूरत के मुकाबले 20 से 25 लाख टन से ज्यादा अतिरिक्त स्टॉक उपलब्ध है। दूसरी ओर विपक्ष एथेनॉल नीति और उत्पादन प्रबंधन जैसे मुद्दों पर सरकार से जवाब मांग रहा है।
सरकार की ओर से शुल्क-मुक्त कच्ची चीनी का आयात, स्टॉक नियंत्रण और बाजार में आपूर्ति बढ़ाने जैसे कदम उठाए जा रहे हैं। अब देखना होगा कि आगामी त्योहारी सीजन में इन उपायों से चीनी की कीमतों पर कितना असर पड़ता है और आम उपभोक्ता को महंगाई से कितनी राहत मिलती है।
मुख्य सवाल: चीनी की बढ़ती कीमतों के पीछे रेड रॉट और अल नीनो को सरकार द्वारा वजह बताना कितना उचित है? क्या एथेनॉल नीति और त्योहारी मांग जैसे दूसरे कारकों को भी समान महत्व दिया जाना चाहिए?

