By: Vikash Kumar Raut (Vicky)
नई दिल्ली। देश में घरेलू एलपीजी (LPG) सिलेंडर की बढ़ती कीमतों के बीच केंद्र सरकार की उज्ज्वला योजना को लेकर एक नई बहस शुरू हो गई है। हाल ही में तेल वितरण कंपनियों द्वारा 14.2 किलोग्राम वाले घरेलू एलपीजी सिलेंडर की कीमत में 29 रुपये की बढ़ोतरी की गई थी। यह तीन महीने के भीतर दूसरी बार था जब घरेलू गैस सिलेंडर महंगा हुआ। ऐसे समय में उज्ज्वला योजना के तहत मिलने वाले सब्सिडी वाले सिलेंडरों की संख्या 9 से घटाकर 4 किए जाने की चर्चा ने लाखों लाभार्थी परिवारों की चिंता बढ़ा दी है।

प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना की शुरुआत ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को स्वच्छ ईंधन उपलब्ध कराने के उद्देश्य से की गई थी। इस योजना के तहत करोड़ों महिलाओं को मुफ्त गैस कनेक्शन उपलब्ध कराए गए, जिससे उन्हें पारंपरिक ईंधन जैसे लकड़ी, गोबर और कोयले के धुएं से राहत मिली। योजना को देश की सबसे सफल सामाजिक कल्याण योजनाओं में गिना जाता है।
हालांकि, गैस सिलेंडर की लगातार बढ़ती कीमतें और सब्सिडी से जुड़े नियमों में बदलाव योजना की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े कर रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सब्सिडी वाले सिलेंडरों की संख्या कम की जाती है तो इसका सीधा असर उन परिवारों पर पड़ेगा जिनकी मासिक आय सीमित है और जो पहले से ही महंगाई के दबाव का सामना कर रहे हैं।

ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले कई परिवारों के लिए एलपीजी सिलेंडर आज भी एक महंगा विकल्प माना जाता है। उज्ज्वला योजना ने इन परिवारों को गैस कनेक्शन तो उपलब्ध करा दिया, लेकिन सिलेंडर रिफिल कराने की लागत कई बार उनके बजट से बाहर चली जाती है। ऐसे में सब्सिडी वाले सिलेंडरों की संख्या कम होने पर बड़ी संख्या में लाभार्थी फिर से पारंपरिक ईंधन की ओर लौट सकते हैं।
आर्थिक मामलों के जानकारों का कहना है कि सरकार को एक ओर राजकोषीय संतुलन बनाए रखने की चुनौती का सामना करना पड़ता है, वहीं दूसरी ओर गरीब और निम्न आय वर्ग के परिवारों को राहत देना भी जरूरी होता है। एलपीजी पर दी जाने वाली सब्सिडी सरकार के खर्च का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होती है। ऐसे में खर्च कम करने के उद्देश्य से यदि लाभों में कटौती की जाती है तो इसका सामाजिक प्रभाव भी देखने को मिल सकता है।

विपक्षी दलों ने भी इस मुद्दे को लेकर सरकार पर निशाना साधा है। उनका कहना है कि लगातार बढ़ती महंगाई के बीच गरीब परिवारों को मिलने वाली राहत कम करना उचित नहीं है। विपक्ष का दावा है कि उज्ज्वला योजना का मूल उद्देश्य स्वच्छ ईंधन को गरीबों की पहुंच में बनाए रखना था और यदि सिलेंडरों की संख्या घटती है तो योजना का उद्देश्य प्रभावित हो सकता है।
दूसरी ओर सरकार समर्थकों का तर्क है कि सरकार विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं के माध्यम से गरीब वर्ग को सहायता प्रदान कर रही है। उनका कहना है कि आर्थिक परिस्थितियों और वैश्विक ऊर्जा बाजार में उतार-चढ़ाव को देखते हुए संसाधनों का संतुलित उपयोग आवश्यक है। इसके अलावा सरकार समय-समय पर उज्ज्वला लाभार्थियों के लिए विशेष सहायता पैकेज और अतिरिक्त सब्सिडी भी जारी करती रही है।

ऊर्जा क्षेत्र के विशेषज्ञों के अनुसार, भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए काफी हद तक आयात पर निर्भर है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल और गैस की कीमतों में बदलाव का असर घरेलू बाजार पर भी पड़ता है। यही कारण है कि एलपीजी सिलेंडर की कीमतों में समय-समय पर वृद्धि या कमी देखने को मिलती है। लेकिन जब कीमतें लगातार बढ़ती हैं, तब इसका सबसे अधिक प्रभाव निम्न आय वर्ग पर पड़ता है।
महिलाओं के स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से भी उज्ज्वला योजना महत्वपूर्ण मानी जाती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन सहित कई संस्थाओं ने पारंपरिक ईंधन से निकलने वाले धुएं को स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बताया है। यदि महंगाई या सब्सिडी में कमी के कारण लोग दोबारा लकड़ी और कोयले का उपयोग करने लगते हैं, तो इसका असर महिलाओं और बच्चों के स्वास्थ्य पर पड़ सकता है।

सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि सरकार को ऐसी नीति अपनानी चाहिए जिससे गरीब परिवारों को स्वच्छ ईंधन का उपयोग जारी रखने के लिए प्रोत्साहन मिलता रहे। उनका सुझाव है कि आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए अतिरिक्त सहायता या लक्षित सब्सिडी की व्यवस्था की जा सकती है ताकि उन्हें बढ़ती कीमतों का बोझ कम महसूस हो।

फिलहाल एलपीजी की कीमतों और उज्ज्वला योजना को लेकर देशभर में चर्चा जारी है। आम उपभोक्ता उम्मीद कर रहे हैं कि सरकार महंगाई से राहत देने के लिए कोई सकारात्मक कदम उठाएगी। आने वाले समय में सरकार की नीतियां यह तय करेंगी कि स्वच्छ ईंधन को लेकर शुरू की गई इस महत्वाकांक्षी योजना का लाभ गरीब परिवारों तक किस स्तर तक पहुंचता रहेगा।
उज्ज्वला योजना ने करोड़ों महिलाओं के जीवन में बदलाव लाने का काम किया है। लेकिन एलपीजी की बढ़ती कीमतें और सब्सिडी संबंधी बदलाव इस योजना की पहुंच और प्रभाव को प्रभावित कर सकते हैं। ऐसे में सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती आर्थिक संतुलन और सामाजिक कल्याण के बीच उचित तालमेल स्थापित करने की होगी।

