By: Vikash Kumar Raut (Vicky)
नई दिल्ली। देशभर में दवा विक्रेताओं के सबसे बड़े संगठन ऑल इंडिया ऑर्गेनाइजेशन ऑफ केमिस्ट एंड ड्रगिस्ट (AIOCD) ने ऑनलाइन दवा बिक्री के विरोध में बड़ा आंदोलन शुरू किया है। संगठन का दावा है कि इस विरोध प्रदर्शन के तहत देशभर के करीब 15 लाख से अधिक केमिस्ट और ड्रगिस्ट अपनी दुकानें बंद रखेंगे। इस हड़ताल का असर छोटे शहरों से लेकर महानगरों तक देखने को मिल सकता है।

AIOCD का कहना है कि ऑनलाइन दवा बिक्री तेजी से बढ़ रही है, जिससे पारंपरिक मेडिकल स्टोर कारोबार प्रभावित हो रहा है। संगठन के अनुसार, बिना उचित निगरानी और नियमों के ऑनलाइन दवा बिक्री से मरीजों की सेहत पर भी गंभीर खतरा पैदा हो सकता है। केमिस्ट संगठनों का आरोप है कि कई ऑनलाइन प्लेटफॉर्म बिना डॉक्टर की वैध पर्ची के दवाएं उपलब्ध करा रहे हैं, जो कानून और स्वास्थ्य सुरक्षा दोनों के खिलाफ है।

संगठन के पदाधिकारियों का कहना है कि लंबे समय से सरकार से इस मुद्दे पर सख्त नियम बनाने की मांग की जा रही है, लेकिन अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। इसी कारण देशभर के केमिस्टों ने सामूहिक हड़ताल का फैसला लिया है। उनका मानना है कि अगर ऑनलाइन दवा बिक्री को नियंत्रित नहीं किया गया तो लाखों छोटे मेडिकल स्टोर बंद होने की कगार पर पहुंच जाएंगे।

हालांकि, मरीजों को परेशानी से बचाने के लिए आपातकालीन दवाओं की आपूर्ति के लिए विशेष इंतजाम किए गए हैं। कई राज्यों में अस्पतालों और इमरजेंसी मेडिकल सेवाओं को हड़ताल से अलग रखा गया है ताकि गंभीर मरीजों को दिक्कत न हो। AIOCD ने स्पष्ट किया है कि उनका उद्देश्य मरीजों को नुकसान पहुंचाना नहीं बल्कि सरकार का ध्यान इस गंभीर मुद्दे की ओर आकर्षित करना है।
इस हड़ताल को लेकर आम लोगों की प्रतिक्रिया भी मिली-जुली देखने को मिल रही है। कुछ लोग केमिस्ट संगठनों की मांग को सही ठहरा रहे हैं, जबकि कई उपभोक्ता ऑनलाइन दवा सेवाओं को सुविधाजनक और समय बचाने वाला विकल्प मानते हैं। खासकर बड़े शहरों में ऑनलाइन दवा डिलीवरी ने लोगों की जिंदगी को आसान बनाया है। घर बैठे दवा मिलने की सुविधा और भारी डिस्काउंट के कारण बड़ी संख्या में ग्राहक ऑनलाइन प्लेटफॉर्म की ओर आकर्षित हुए हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि ऑनलाइन दवा बिक्री पूरी तरह गलत नहीं है, लेकिन इसके लिए मजबूत नियमन और निगरानी बेहद जरूरी है। हेल्थ सेक्टर से जुड़े जानकारों के मुताबिक, अगर सही तरीके से नियम बनाए जाएं तो ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों मॉडल साथ-साथ चल सकते हैं। मरीजों की सुरक्षा, डॉक्टर की पर्ची की जांच और दवाओं की गुणवत्ता सुनिश्चित करना सरकार की सबसे बड़ी जिम्मेदारी होनी चाहिए।

उधर, ऑनलाइन फार्मेसी कंपनियों का कहना है कि वे सभी सरकारी नियमों का पालन करती हैं और ग्राहकों को सुरक्षित सेवाएं देने के लिए प्रतिबद्ध हैं। उनका तर्क है कि डिजिटल हेल्थ सेवाएं भविष्य की जरूरत हैं और इससे दूरदराज इलाकों में रहने वाले लोगों को भी आसानी से दवाएं मिल पाती हैं। कंपनियों का यह भी कहना है कि तकनीक को रोकने के बजाय उसे बेहतर नियमों के साथ अपनाया जाना चाहिए।

इस पूरे विवाद के बीच सरकार की भूमिका सबसे अहम मानी जा रही है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार को जल्द ही ऐसा संतुलित समाधान निकालना होगा जिससे छोटे व्यापारियों के हित भी सुरक्षित रहें और आम जनता को आधुनिक सुविधाओं का लाभ भी मिलता रहे। अगर इस मुद्दे का समाधान समय पर नहीं

