By: Mala Mandal
देवघर। विश्व प्रसिद्ध श्रावणी मेले के दौरान बाबा बैद्यनाथ धाम आने वाले लाखों शिवभक्तों के बीच हर वर्ष आस्था के साथ सेवा का भी अद्भुत संगम देखने को मिलता है। इसी कड़ी में इस वर्ष मद्रास कांवड़ संघ अपनी अनूठी सेवा भावना के कारण श्रद्धालुओं के बीच विशेष आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। यह संघ पिछले 25 वर्षों से लगातार शिवभक्ति और मानव सेवा की अनूठी परंपरा निभाते हुए सुल्तानगंज से देवघर तक की 108 किलोमीटर की कठिन पदयात्रा करता आ रहा है।

आमतौर पर श्रद्धालु सुल्तानगंज से उत्तरवाहिनी गंगा का पवित्र जल लेकर 108 किलोमीटर की पैदल यात्रा पूरी कर बाबा बैद्यनाथ मंदिर में जलाभिषेक करते हैं। लेकिन मद्रास कांवड़ संघ की पहचान केवल जलार्पण तक सीमित नहीं है। इस संघ के लगभग 90 कांवरिए पूरी यात्रा के दौरान सेवा और समर्पण की ऐसी मिसाल पेश करते हैं, जो हर किसी को प्रेरित करती है।

दिनभर की कठिन पदयात्रा के बाद जब अधिकांश श्रद्धालु विश्राम करते हैं, तब मद्रास कांवड़ संघ के सदस्य अपने सेवा कार्य में जुट जाते हैं। जहां भी उनका रात्रि विश्राम होता है, वहां सभी सदस्य मिलकर सामूहिक रूप से शुद्ध, सात्विक और स्वच्छ भोजन तैयार करते हैं। भोजन तैयार होने के बाद उसे प्रसाद के रूप में आसपास मौजूद अन्य कांवरियों और जरूरतमंद श्रद्धालुओं के बीच पूरी श्रद्धा के साथ निःशुल्क वितरित किया जाता है।

इस सेवा कार्य में संघ के सभी सदस्य बिना किसी भेदभाव के भाग लेते हैं। कोई सब्जी काटता है, कोई भोजन पकाता है, तो कोई प्रसाद वितरण की जिम्मेदारी संभालता है। दिनभर की थकान के बावजूद उनके चेहरे पर सेवा का उत्साह और बाबा भोलेनाथ के प्रति अटूट श्रद्धा साफ दिखाई देती है।

संघ के सदस्यों का कहना है कि उनके लिए शिवभक्ति केवल मंदिर जाकर जल चढ़ाने तक सीमित नहीं है। उनका मानना है कि भगवान शिव के भक्तों की सेवा करना भी उतना ही बड़ा पुण्य है, जितना स्वयं भगवान की पूजा करना। यही सोच पिछले ढाई दशक से उनकी यात्रा की सबसे बड़ी पहचान बन चुकी है।

जब मद्रास कांवड़ संघ के सदस्यों से बातचीत की गई तो उन्होंने बताया कि वे पिछले 25 वर्षों से लगातार इसी सेवा भावना के साथ श्रावणी यात्रा में शामिल होते आ रहे हैं। हर वर्ष वे अपने खर्च पर भोजन सामग्री लेकर चलते हैं और यात्रा के दौरान प्रतिदिन सैकड़ों कांवरियों को प्रसाद ग्रहण कराते हैं। उनका उद्देश्य केवल भोजन कराना नहीं, बल्कि सेवा, सहयोग और मानवता का संदेश समाज तक पहुंचाना है।

संघ के सदस्यों ने बताया कि शिवभक्ति का वास्तविक अर्थ केवल पूजा-अर्चना नहीं, बल्कि जरूरतमंद की सहायता करना भी है। यदि कोई थका हुआ कांवरिया प्रेम से दिया गया भोजन ग्रहण कर संतुष्ट हो जाता है, तो वही उनके लिए सबसे बड़ी पूजा और बाबा बैद्यनाथ का आशीर्वाद है।

श्रावणी मेले में जहां लाखों श्रद्धालु विभिन्न राज्यों से देवघर पहुंचते हैं, वहीं मद्रास कांवड़ संघ जैसी संस्थाएं यह संदेश देती हैं कि धार्मिक यात्रा केवल व्यक्तिगत आस्था तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि उसमें सामाजिक जिम्मेदारी और सेवा का भाव भी शामिल होना चाहिए। यही कारण है कि उनकी यह पहल हर वर्ष लोगों को प्रभावित करती है और अनेक श्रद्धालु भी उनसे प्रेरणा लेकर सेवा कार्यों में जुड़ने लगे हैं।
श्रावणी यात्रा के दौरान निःस्वार्थ सेवा का यह उदाहरण देवघर की धार्मिक संस्कृति को और भी समृद्ध बनाता है। मद्रास कांवड़ संघ की यह पहल यह साबित करती है कि आस्था तब और अधिक सार्थक हो जाती है, जब उसमें मानवता, सहयोग और सेवा का भाव जुड़ जाता है।

आज जब समाज में निःस्वार्थ सेवा के उदाहरण कम देखने को मिलते हैं, ऐसे समय में मद्रास कांवड़ संघ का यह प्रयास न केवल शिवभक्ति की नई परिभाषा प्रस्तुत करता है, बल्कि यह भी बताता है कि समर्पण, सेवा और सहयोग ही सनातन संस्कृति की सबसे बड़ी पहचान है। बाबा बैद्यनाथ की नगरी देवघर में उनकी यह परंपरा हजारों श्रद्धालुओं के लिए प्रेरणा बन रही है और आने वाली पीढ़ियों को भी सेवा का संदेश दे रही है।

