By: Mala Mandal
देवघर। एक तरफ कारखानों में मशीनों की सफाई हो रही है, कहीं दुकानों में औजारों को सजाया जा रहा है तो कहीं गैरेज और वर्कशॉप में सुबह से ही पूजा की तैयारियां चल रही हैं। लोहे की मशीनों पर फूल चढ़ाए जाते हैं, औजारों को साफ कर उनके सामने दीप जलाया जाता है और फिर भगवान विश्वकर्मा की आराधना की जाती है। यह सिर्फ एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि मेहनत, हुनर, तकनीक और निर्माण के प्रति सम्मान का पर्व है। यही वजह है कि विश्वकर्मा पूजा आज भी देश के लाखों कारीगरों, मजदूरों, इंजीनियरों, तकनीकी कर्मियों, वाहन व्यवसायियों और औद्योगिक प्रतिष्ठानों के लिए विशेष महत्व रखती है। विश्वकर्मा पूजा को भगवान विश्वकर्मा की जयंती के रूप में भी मनाया जाता है। हिंदू धार्मिक परंपरा में भगवान विश्वकर्मा को देवताओं के शिल्पकार, वास्तुकार और निर्माण-कला के अधिष्ठाता देवता के रूप में माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार उन्होंने अनेक दिव्य भवनों, नगरों और अस्त्र-शस्त्रों का निर्माण किया था। इसी कारण निर्माण और तकनीकी कार्यों से जुड़े लोग उन्हें अपने कार्य का संरक्षक मानते हैं।

कौन हैं भगवान विश्वकर्मा?
पौराणिक मान्यताओं में भगवान विश्वकर्मा को ऐसी दिव्य शक्ति के रूप में वर्णित किया गया है, जिन्होंने अपनी कला और शिल्प कौशल से देवताओं के लिए अद्भुत रचनाएं तैयार कीं। अलग-अलग धार्मिक ग्रंथों और परंपराओं में उनके निर्माण कार्यों का अलग-अलग वर्णन मिलता है। मान्यता है कि भगवान विश्वकर्मा ने भगवान कृष्ण के लिए द्वारका नगरी, पांडवों के लिए इंद्रप्रस्थ और देवताओं के लिए स्वर्गलोक जैसी अद्भुत संरचनाओं का निर्माण किया। धार्मिक परंपरा में उन्हें भगवान शिव के त्रिशूल, भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र और भगवान कार्तिकेय के भाले जैसे दिव्य अस्त्रों के निर्माण से भी जोड़ा जाता है। यही वजह है कि विश्वकर्मा पूजा का संबंध केवल किसी एक पेशे से नहीं है। लोहार, बढ़ई, मिस्त्री, इंजीनियर, मैकेनिक, मशीन ऑपरेटर, कारखाना कर्मचारी, इलेक्ट्रिशियन से लेकर आधुनिक तकनीकी क्षेत्र से जुड़े लोग भी इस दिन अपने काम के उपकरणों और मशीनों की पूजा करते हैं।

आखिर क्यों प्रसिद्ध है विश्वकर्मा पूजा?
विश्वकर्मा पूजा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें काम और काम के साधनों दोनों को सम्मान दिया जाता है। आम दिनों में जिन मशीनों और औजारों से रोजी-रोटी चलती है, इस दिन उन्हीं को साफ किया जाता है, सजाया जाता है और उनकी पूजा की जाती है। किसी फैक्टरी में बड़ी मशीनों की पूजा होती है तो किसी ऑटोमोबाइल गैराज में बाइक और कार की सर्विसिंग करने वाले उपकरणों पर फूल चढ़ाए जाते हैं। कहीं बढ़ई अपने औजारों की पूजा करता है तो कहीं लोहार अपनी भट्ठी और हथौड़े को प्रणाम करता है। इस तरह यह पर्व मेहनतकश समाज के लिए अपने श्रम और हुनर के प्रति सम्मान व्यक्त करने का अवसर भी बन जाता है। विश्वकर्मा पूजा को इसी कारण तकनीकी और औद्योगिक क्षेत्र से जोड़कर देखा जाता है। पूजा के दिन कई प्रतिष्ठानों में मशीनों का नियमित काम रोककर विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। कुछ स्थानों पर प्रसाद वितरण और भंडारे का आयोजन भी होता है।

कहां-कहां विशेष रूप से मनाई जाती है विश्वकर्मा पूजा?
भारत के कई राज्यों में विश्वकर्मा पूजा श्रद्धा के साथ मनाई जाती है, लेकिन पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड और ओडिशा में इस पर्व की विशेष लोकप्रियता देखने को मिलती है। इसके अलावा उत्तर भारत और देश के औद्योगिक क्षेत्रों में भी कारखानों, वर्कशॉप, परिवहन प्रतिष्ठानों और तकनीकी संस्थानों में भगवान विश्वकर्मा की पूजा की जाती है। विशेष रूप से पूर्वी भारत में विश्वकर्मा पूजा का सामाजिक और औद्योगिक जीवन से गहरा जुड़ाव दिखाई देता है। पश्चिम बंगाल में यह पर्व लंबे समय से बड़े उत्सव के रूप में मनाया जाता रहा है। वहीं बिहार और झारखंड के औद्योगिक एवं व्यवसायिक क्षेत्रों में भी मशीन, वाहन और औजारों की पूजा की परंपरा काफी प्रचलित है।

पूजा के दिन मशीनों से लेकर वाहनों तक की होती है पूजा
विश्वकर्मा पूजा के दिन सुबह से ही वर्कशॉप, गैरेज, कारखाने और दुकानों में विशेष तैयारी देखने को मिलती है। मशीनों और उपकरणों की सफाई की जाती है। उन्हें फूल-माला से सजाया जाता है। इसके बाद भगवान विश्वकर्मा की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित कर विधि-विधान से पूजा की जाती है। वाहन कारोबार से जुड़े लोग भी इस अवसर को विशेष मानते हैं। कई जगह नए वाहन की खरीद को शुभ माना जाता है। ऑटोमोबाइल वर्कशॉप में मैकेनिक अपने औजारों और मशीनों की पूजा करते हैं। उद्योगों में बड़े संयंत्रों और उत्पादन में इस्तेमाल होने वाले उपकरणों पर पूजा-अर्चना की जाती है।

भाद्र संक्रांति से जुड़ा है पर्व
विश्वकर्मा पूजा का संबंध कन्या संक्रांति से माना जाता है। बंगाली कैलेंडर में इसे भाद्र महीने के अंतिम दिन मनाने की परंपरा है। इसी वजह से इसकी तिथि सामान्य त्योहारों की तरह स्थिर तारीख के बजाय संक्रांति के आधार पर निर्धारित होती है। धार्मिक मान्यता के साथ-साथ इस पर्व का एक सामाजिक संदेश भी है। मशीनें कितनी भी आधुनिक क्यों न हो जाएं, उन्हें चलाने वाला इंसान और उसका हुनर ही किसी काम को पूरा करता है। विश्वकर्मा पूजा इसी मेहनत और रचनात्मकता को सम्मान देने का अवसर बनती है।

परंपरा से आधुनिक तकनीक तक पहुंचा पर्व
आज का दौर मशीनों और तकनीक का है। कारखानों में ऑटोमेशन बढ़ रहा है, कंप्यूटर और रोबोट उत्पादन प्रक्रिया का हिस्सा बन चुके हैं और आधुनिक इंजीनियरिंग ने निर्माण की दुनिया को पूरी तरह बदल दिया है। इसके बावजूद विश्वकर्मा पूजा की प्रासंगिकता कम नहीं हुई है। बल्कि बदलते समय के साथ इसका स्वरूप और व्यापक हुआ है। अब पारंपरिक कारीगरों के साथ इंजीनियर, तकनीकी कर्मचारी, ऑटोमोबाइल व्यवसायी, इलेक्ट्रिशियन और विभिन्न औद्योगिक क्षेत्रों से जुड़े लोग भी इस पर्व में शामिल होते हैं।

इस पर्व का संदेश साफ है—जिस औजार से मेहनत होती है, उसका सम्मान होना चाहिए और जिस हुनर से निर्माण होता है, उसकी कद्र होनी चाहिए। शायद यही कारण है कि हजारों वर्षों पुरानी शिल्प और निर्माण की यह परंपरा आज भी आधुनिक भारत की फैक्ट्रियों, वर्कशॉप और बाजारों में उसी श्रद्धा के साथ दिखाई देती है।
विश्वकर्मा पूजा इसलिए केवल भगवान विश्वकर्मा की आराधना का दिन नहीं, बल्कि श्रम, कौशल, तकनीक, निर्माण और आत्मनिर्भरता के सम्मान का पर्व भी बन चुका है।


