By: Vikash Kumar Raut (Vicky)
देवघर का बाबा बैद्यनाथ धाम देश के प्रमुख शिव तीर्थों में शामिल है। द्वादश ज्योतिर्लिंगों में बाबा बैद्यनाथ का विशेष स्थान है। हर साल लाखों श्रद्धालु बाबा के दर्शन और जलाभिषेक के लिए देवघर पहुंचते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जिस भव्य बैद्यनाथ मंदिर में भगवान शिव ज्योतिर्लिंग के रूप में विराजमान हैं, आखिर इस मंदिर का निर्माण किसने कराया था? इसी सवाल से जुड़ी एक प्रचलित पौराणिक मान्यता भगवान विश्वकर्मा से जुड़ी हुई है। हिंदू धार्मिक परंपरा में भगवान विश्वकर्मा को देवताओं का दिव्य शिल्पकार और वास्तुकार माना जाता है। इसी वजह से देश के कई प्राचीन मंदिरों और धार्मिक स्थलों के निर्माण से जुड़ी लोक एवं पौराणिक कथाओं में भगवान विश्वकर्मा का उल्लेख मिलता है।

बैद्यनाथ धाम को लेकर भी स्थानीय धार्मिक मान्यताओं और जनश्रुतियों में भगवान विश्वकर्मा के निर्माण से जुड़ी बातें सुनने को मिलती हैं। हालांकि, इसे ऐतिहासिक तथ्य के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा। उपलब्ध आधिकारिक ऐतिहासिक विवरण में बैद्यनाथ मंदिर के मूल निर्माता का नाम निश्चित रूप से दर्ज नहीं है।

देवघर जिला प्रशासन की आधिकारिक वेबसाइट क्या कहती है?
देवघर जिला प्रशासन के आधिकारिक विवरण के अनुसार बैद्यनाथधाम की उत्पत्ति बहुत प्राचीन है और इसका इतिहास पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। संस्कृत ग्रंथों में इस क्षेत्र का उल्लेख हरिताकिवन और केतकीवन जैसे नामों से मिलता है। आधिकारिक विवरण में साफ कहा गया है कि मंदिर का निर्माण किसने कराया, इसका निश्चित प्रमाण उपलब्ध नहीं है। हालांकि, मंदिर के सामने के कुछ हिस्से के निर्माण का संबंध गिधौर महाराजा के पूर्वज पूरनमल से बताया गया है।

आधिकारिक विवरण के मुताबिक वर्ष 1596 में पूरनमल ने मंदिर के सामने के कुछ हिस्से का निर्माण कराया था। मंदिर के शिखर पर लगे स्वर्ण कलश और पंचशूल का भी ऐतिहासिक विवरण दिया गया है। मुख्य मंदिर की ऊंचाई लगभग 72 फीट बताई गई है। यानी इतिहास की दृष्टि से यह कहना सही नहीं होगा कि “बैद्यनाथ मंदिर का निर्माण भगवान विश्वकर्मा ने ही किया था।” इसके बजाय इसे इस तरह समझना ज्यादा उचित है कि भगवान विश्वकर्मा से जुड़ी बात धार्मिक मान्यता और लोककथा का हिस्सा हो सकती है, जबकि मंदिर के निर्माण का प्रमाणित इतिहास अलग विषय है।

रावण से भी जुड़ी है बैद्यनाथ धाम की कथा
बाबा बैद्यनाथ धाम की पहचान सिर्फ मंदिर की स्थापत्य परंपरा से नहीं, बल्कि रावण से जुड़ी पौराणिक कथा से भी है। धार्मिक मान्यता के अनुसार लंकापति रावण भगवान शिव को लंका ले जाना चाहता था। इसी कथा के कारण बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग की स्थापना से जुड़ी कई धार्मिक मान्यताएं प्रचलित हैं। भारत सरकार के पर्यटन मंत्रालय के विवरण में भी बैद्यनाथ मंदिर के शिवलिंग से जुड़ी रावण की कथा का उल्लेख मिलता है। मंदिर परिसर के पास स्थित चंद्रकूप के बारे में भी धार्मिक मान्यता बताई गई है कि इसे रावण से संबंधित परंपरा में महत्वपूर्ण माना जाता है। आज बैद्यनाथ मंदिर का विशाल परिसर श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है। यहां मुख्य मंदिर के अलावा कई अन्य मंदिर भी मौजूद हैं। भारत सरकार के पर्यटन विवरण के अनुसार मंदिर परिसर पत्थर की दीवारों से घिरा हुआ है और परिसर में कुल 22 अन्य मंदिरों का भी उल्लेख मिलता है।

तो आखिर सच क्या है?
सच यह है कि बैद्यनाथ धाम मंदिर की प्राचीनता और धार्मिक महत्ता निर्विवाद रूप से बेहद महत्वपूर्ण है, लेकिन इसके मूल निर्माता के रूप में भगवान विश्वकर्मा का नाम प्रमाणित ऐतिहासिक तथ्य के तौर पर उपलब्ध नहीं है। इसलिए अगर विश्वकर्मा पूजा के अवसर पर बैद्यनाथ धाम से जुड़ी खबर बनाई जा रही है, तो खबर में यह कहना ज्यादा सटीक होगा कि “धार्मिक मान्यताओं में भगवान विश्वकर्मा को देव शिल्पी माना जाता है और बैद्यनाथ धाम के निर्माण से भी कुछ लोकमान्यताएं उन्हें जोड़ती हैं, लेकिन मंदिर के मूल निर्माता का प्रमाणित इतिहास स्पष्ट नहीं है।”

यही अंतर आस्था, लोकमान्यता और इतिहास के बीच की सीमा को स्पष्ट करता है।
बाबा बैद्यनाथ धाम आज भी करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है और देवघर की पहचान इसी प्राचीन ज्योतिर्लिंग मंदिर से देश-दुनिया तक बनी हुई है।


