By: Vikash Kumar Raut (Vicky)
नई दिल्ली। केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) की ऑन-स्क्रीन मार्किंग प्रणाली और री-इवैल्यूएशन प्रक्रिया को लेकर कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने एक बार फिर केंद्र सरकार और बोर्ड पर निशाना साधा है। राहुल गांधी ने आरोप लगाया है कि यदि किसी छात्र को अपने प्राप्त अंकों पर संदेह होता है और वह अपनी उत्तर पुस्तिका की जांच करवाना चाहता है, तो उसे इसके लिए हजारों रुपये तक खर्च करने पड़ सकते हैं। उन्होंने इसे छात्रों और अभिभावकों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ बताते हुए शिक्षा व्यवस्था में अधिक पारदर्शिता की मांग की है। राहुल गांधी ने कहा कि परीक्षा परिणाम किसी भी छात्र के भविष्य को तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ऐसे में यदि मूल्यांकन प्रक्रिया में किसी प्रकार की गलती होती है और छात्र उसे सुधारने के लिए आवेदन करता है, तो उससे भारी शुल्क लेना उचित नहीं माना जा सकता। उन्होंने दावा किया कि कई मामलों में छात्रों को अपनी उत्तर पुस्तिका की कॉपी प्राप्त करने, अंकों के सत्यापन और री-इवैल्यूएशन की प्रक्रिया पूरी करने के लिए 2000 रुपये या उससे अधिक तक खर्च करने पड़ सकते हैं।

क्या है CBSE का ऑन-स्क्रीन मार्किंग सिस्टम?
CBSE पिछले कुछ वर्षों से उत्तर पुस्तिकाओं के मूल्यांकन में ऑन-स्क्रीन मार्किंग सिस्टम का उपयोग कर रहा है। इस प्रणाली के तहत छात्रों की उत्तर पुस्तिकाओं को स्कैन किया जाता है और फिर परीक्षक डिजिटल माध्यम से उनका मूल्यांकन करते हैं। बोर्ड का दावा है कि इस तकनीक से मूल्यांकन प्रक्रिया अधिक पारदर्शी, तेज और त्रुटिरहित बनती है।
ऑन-स्क्रीन मूल्यांकन के जरिए उत्तर पुस्तिकाओं के खोने, पन्ने छूटने या अंक जोड़ने में होने वाली गलतियों की संभावना कम होती है। साथ ही बोर्ड का कहना है कि यह प्रणाली मूल्यांकन की गुणवत्ता को बेहतर बनाने में भी मदद करती है। हालांकि समय-समय पर कुछ छात्र और अभिभावक मूल्यांकन में त्रुटियों की शिकायत करते रहे हैं, जिसके कारण री-चेकिंग और री-इवैल्यूएशन की मांग उठती रही है।

री-इवैल्यूएशन फीस को लेकर विवाद
राहुल गांधी का मुख्य आरोप री-इवैल्यूएशन और उत्तर पुस्तिका की जांच से जुड़ी फीस को लेकर है। उनका कहना है कि यदि किसी छात्र को अपने अंकों पर संदेह है तो उसे निष्पक्ष जांच का अधिकार होना चाहिए और इसके लिए अत्यधिक शुल्क नहीं लिया जाना चाहिए।

शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि परीक्षा परिणामों से जुड़ी शिकायतों के निपटारे के लिए एक सरल और किफायती व्यवस्था होनी चाहिए। कई अभिभावकों का भी कहना है कि प्रतियोगी माहौल में कुछ अंकों का अंतर छात्रों के करियर पर बड़ा प्रभाव डाल सकता है। ऐसे में मूल्यांकन प्रक्रिया पर सवाल उठने की स्थिति में छात्रों को आसानी से अपनी उत्तर पुस्तिका की समीक्षा कराने का अवसर मिलना चाहिए।
दूसरी ओर बोर्ड का पक्ष यह रहा है कि री-इवैल्यूएशन और दस्तावेज़ उपलब्ध कराने की प्रक्रिया में प्रशासनिक और तकनीकी खर्च शामिल होते हैं। इसलिए निर्धारित शुल्क लिया जाता है। बोर्ड का कहना है कि सभी प्रक्रियाएं तय नियमों और दिशानिर्देशों के तहत संचालित की जाती हैं।

छात्रों और अभिभावकों की चिंता
CBSE के परिणाम घोषित होने के बाद हर वर्ष कुछ छात्र अपने प्राप्त अंकों से असंतुष्ट रहते हैं। ऐसे मामलों में वे पहले अंकों के सत्यापन, फिर उत्तर पुस्तिका की कॉपी प्राप्त करने और अंत में री-इवैल्यूएशन की प्रक्रिया अपनाते हैं। इस पूरी प्रक्रिया में अलग-अलग चरणों के लिए शुल्क निर्धारित होता है। अभिभावकों का कहना है कि मध्यम वर्ग और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए यह अतिरिक्त खर्च चिंता का विषय बन सकता है। वहीं कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मूल्यांकन पूरी तरह सटीक और पारदर्शी हो तो री-इवैल्यूएशन की आवश्यकता स्वतः कम हो जाएगी।

शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता पर बहस
राहुल गांधी के बयान के बाद शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता, जवाबदेही और छात्रों के अधिकारों को लेकर नई बहस शुरू हो गई है। विपक्ष का कहना है कि परीक्षा प्रणाली को छात्र हितैषी बनाया जाना चाहिए, जबकि सरकार और बोर्ड लगातार तकनीक आधारित मूल्यांकन व्यवस्था को बेहतर बनाने का दावा करते रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल मूल्यांकन प्रणाली आधुनिक शिक्षा व्यवस्था की जरूरत है, लेकिन इसके साथ-साथ शिकायत निवारण तंत्र को भी मजबूत करना आवश्यक है। छात्रों को यह भरोसा होना चाहिए कि यदि मूल्यांकन में कोई त्रुटि होती है तो उसका समाधान सरल, सुलभ और कम लागत में उपलब्ध होगा।

आगे क्या?
CBSE की री-इवैल्यूएशन फीस और ऑन-स्क्रीन मार्किंग सिस्टम को लेकर उठे सवालों ने एक बार फिर परीक्षा मूल्यांकन प्रक्रिया को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। आने वाले दिनों में बोर्ड की ओर से इस मुद्दे पर स्पष्टीकरण या प्रतिक्रिया सामने आ सकती है। फिलहाल छात्रों, अभिभावकों और शिक्षा विशेषज्ञों की नजर इस बात पर बनी हुई है कि मूल्यांकन प्रक्रिया को और अधिक पारदर्शी तथा छात्र हितैषी बनाने के लिए क्या कदम उठाए जाते हैं।
शिक्षा जगत के जानकारों का मानना है कि तकनीक और पारदर्शिता के बीच संतुलन बनाना ही भविष्य की सबसे बड़ी चुनौती होगी। यदि छात्रों का भरोसा मजबूत करना है तो मूल्यांकन प्रक्रिया के साथ-साथ शिकायत निवारण प्रणाली को भी अधिक प्रभावी और किफायती बनाना होगा।

