By: Mala Mandal
देवघर। सावन मास शुरू होते ही देवघर समेत पूरा झारखंड शिवमय हो उठता है। चारों ओर हरियाली, रिमझिम बारिश, मंदिरों में गूंजता हर-हर महादेव का जयघोष और कांवरियों के मुख से निकलता बोल बम का उद्घोष वातावरण को भक्तिमय बना देता है। सावन को भगवान शिव की आराधना के लिए सबसे पवित्र महीनों में से एक माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस महीने में भगवान शिव की पूजा, जलाभिषेक, रुद्राभिषेक और महामृत्युंजय मंत्र का जाप करने से महादेव प्रसन्न होते हैं और भक्तों पर अपनी कृपा बरसाते हैं।

सावन की खासियत यह भी है कि इस दौरान प्रकृति स्वयं भगवान शिव का अभिषेक करती नजर आती है। आसमान से गिरती बारिश की बूंदें मानो शिवलिंग पर जल की धारा के समान प्रतीत होती हैं। पेड़-पौधों पर आई हरियाली और वातावरण में फैली मिट्टी की सोंधी खुशबू सावन की आध्यात्मिक अनुभूति को और गहरा कर देती है।
समुद्र मंथन से जुड़ा है सावन और जलाभिषेक का रहस्य
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार समुद्र मंथन के दौरान जब हलाहल विष निकला तो पूरी सृष्टि संकट में पड़ गई। देवताओं और असुरों के बीच हुए समुद्र मंथन से निकले इस विष का प्रभाव इतना प्रचंड था कि समस्त जीव-जगत के अस्तित्व पर संकट मंडराने लगा। तब भगवान शिव ने सृष्टि की रक्षा के लिए हलाहल विष को अपने कंठ में धारण कर लिया। विष के प्रभाव से भगवान शिव के शरीर में अत्यधिक उष्णता उत्पन्न हो गई। उनकी इस गर्मी को शांत करने के लिए देवी-देवताओं ने महादेव का जलाभिषेक किया। धार्मिक मान्यता है कि इसी घटना के कारण भगवान शिव को जल अर्पित करने की परंपरा विशेष रूप से प्रचलित हुई। सावन में शिवलिंग पर जल और गंगाजल चढ़ाने को इसी पौराणिक कथा से जोड़ा जाता है।

माता पार्वती की तपस्या से भी जुड़ा है सावन
सावन मास का संबंध भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह से भी जोड़ा जाता है। धार्मिक कथाओं के अनुसार माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की थी। उनकी तपस्या और भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें पत्नी के रूप में स्वीकार किया। इसी मान्यता के कारण सावन में कुंवारी कन्याएं मनवांछित वर की कामना से भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करती हैं। कई युवतियां और महिलाएं सावन के सोमवार का व्रत रखती हैं। मान्यता है कि श्रद्धा और नियमपूर्वक शिव आराधना करने से मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

सावन में ससुराल आते हैं भोलेनाथ, जलाभिषेक से स्वागत
लोकमान्यता में सावन को भगवान शिव के ससुराल आगमन से भी जोड़कर देखा जाता है। मान्यता है कि सावन में भोलेनाथ अपनी ससुराल आते हैं और भक्त उनका स्वागत पूजा-अर्चना तथा जलाभिषेक से करते हैं। यही वजह है कि सावन के प्रत्येक सोमवार को शिव मंदिरों में श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ जाती है।देवघर के बाबा बैद्यनाथ मंदिर में भी सावन के दौरान देश के विभिन्न राज्यों से श्रद्धालु पहुंचते हैं। कांवरिया गंगाजल लेकर लंबी दूरी तय करते हुए बाबा बैद्यनाथ धाम पहुंचते हैं और बाबा पर जल अर्पित कर अपनी मनोकामना की पूर्ति की प्रार्थना करते हैं।

महामृत्युंजय मंत्र और मार्कंडेय ऋषि की कथा
सावन मास में महामृत्युंजय मंत्र के जाप को भी विशेष महत्व दिया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार मार्कंडेय ऋषि ने भगवान शिव की आराधना और महामृत्युंजय मंत्र के जाप से महादेव की कृपा प्राप्त की थी। भगवान शिव ने उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर उन्हें दीर्घायु का वरदान दिया। इसी वजह से सावन में कई श्रद्धालु महामृत्युंजय मंत्र का जाप करते हैं। मंदिरों और घरों में शिव चालीसा, रुद्राष्टक और अन्य शिव स्तोत्रों का पाठ भी किया जाता है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि शिव आराधना से मानसिक शांति, सकारात्मक ऊर्जा और आत्मविश्वास की अनुभूति होती है।

बाबा बैद्यनाथ धाम में सावन का विशेष महत्व
देवघर स्थित बाबा बैद्यनाथ धाम देश के प्रमुख शिव तीर्थस्थलों में शामिल है। सावन के दौरान यहां आस्था का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। दूर-दराज से आने वाले कांवरिये पवित्र गंगाजल लेकर बाबा बैद्यनाथ का जलाभिषेक करते हैं। धार्मिक मान्यताओं में बाबा बैद्यनाथ धाम की महिमा का वर्णन विभिन्न कथाओं में मिलता है। सावन के दौरान पूरा देवघर भगवामय नजर आता है। सड़कों पर कांवरियों की कतार, शिवभक्तों के जयघोष और मंदिर परिसर में होने वाली पूजा-अर्चना बाबा नगरी की आध्यात्मिक पहचान को और मजबूत करती है।

16 सोमवार व्रत की भी विशेष मान्यता
भगवान शिव की आराधना में सोमवार के व्रत का विशेष महत्व माना जाता है। सावन के सोमवार को बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपवास रखते हैं। कुंवारी कन्याएं मनवांछित पति की कामना से और विवाहित महिलाएं सुखी दांपत्य जीवन एवं परिवार की सुख-समृद्धि के लिए शिव-पार्वती की पूजा करती हैं। कई श्रद्धालु 16 सोमवार व्रत का संकल्प भी लेते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार लगातार 16 सोमवार तक श्रद्धा और नियमपूर्वक भगवान शिव की पूजा करने से मनोकामना पूरी होने का आशीर्वाद मिलता है।

मधुश्रावणी में भी होती है शिव-पार्वती की आराधना
सावन मास में मिथिला क्षेत्र की प्रसिद्ध मधुश्रावणी पूजा का भी विशेष महत्व है। नवविवाहित महिलाएं इस परंपरा के तहत शिव-पार्वती सहित विभिन्न देवी-देवताओं की पूजा करती हैं। पूजा के दौरान धार्मिक कथाओं का श्रवण किया जाता है और सुखी दांपत्य जीवन की कामना की जाती है। मधुश्रावणी की परंपरा सावन के धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व को और व्यापक बनाती है। इसमें नवविवाहित महिलाओं की आस्था, परिवार की सुख-समृद्धि और वैवाहिक जीवन में प्रेम एवं सौहार्द की कामना जुड़ी होती है।

प्रकृति और भक्ति का अनूठा संगम है सावन
सावन केवल एक धार्मिक महीना नहीं, बल्कि प्रकृति और आध्यात्मिकता के मिलन का पर्व भी है। बारिश की बूंदों से नहाई धरती, चारों ओर फैली हरियाली और शिवालयों में गूंजता हर-हर महादेव का जयघोष वातावरण को शिवमय बना देता है।
देवघर में सावन का महत्व और भी बढ़ जाता है, क्योंकि यहां बाबा बैद्यनाथ के दर्शन और जलाभिषेक के लिए देश के अलग-अलग हिस्सों से श्रद्धालु पहुंचते हैं। भक्तों के लिए सावन श्रद्धा, तप, आस्था और समर्पण का महीना है। यही वह समय है जब शिवभक्त पूरी श्रद्धा के साथ बाबा भोलेनाथ का जलाभिषेक कर सुख, शांति, समृद्धि और मनोकामना पूर्ति का आशीर्वाद मांगते हैं।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सावन में बरसने वाली बारिश की बूंदें भी मानो भोलेनाथ का अभिषेक करती हैं और पूरी प्रकृति महादेव की भक्ति में लीन नजर आती है।

