By: Mala Mandal
रांची। खनिज संशोधन विधेयक को लेकर झारखंड और केंद्र सरकार के बीच टकराव के आसार बढ़ते नजर आ रहे हैं। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने केंद्र सरकार के प्रस्तावित खनिज संशोधन कानून पर कड़ा ऐतराज जताते हुए इसे वापस लेने की मांग की है। मुख्यमंत्री ने स्पष्ट शब्दों में चेतावनी दी कि यदि केंद्र सरकार इस बिल को वापस नहीं लेती है तो ऐसा आंदोलन किया जाएगा, जिसे पूरा देश देखेगा। उनके इस बयान के बाद झारखंड की राजनीति में खनिज संपदा, राज्य के अधिकार और केंद्र-राज्य संबंधों को लेकर बहस तेज हो गई है। झारखंड देश के प्रमुख खनिज उत्पादक राज्यों में शामिल है। कोयला, लौह अयस्क, बॉक्साइट और अन्य खनिज संसाधन राज्य की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ऐसे में खनिजों से जुड़े कानून में किसी भी बड़े बदलाव का सीधा असर राज्य के राजस्व, स्थानीय विकास और खनन क्षेत्र से जुड़े हितों पर पड़ सकता है।

राज्य के अधिकारों का मुद्दा उठा रहे हेमंत सोरेन
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का विरोध मुख्य रूप से इस बात को लेकर है कि खनिजों पर राज्यों के वित्तीय अधिकार सीमित होने से झारखंड को बड़ा आर्थिक नुकसान हो सकता है। हालिया रिपोर्टों में दावा किया गया है कि नए प्रावधानों के लागू होने पर झारखंड की खनिजों से संबंधित सेस वसूली की क्षमता प्रभावित हो सकती है। रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2024-25 में राज्य को खनिज सेस से करीब 1,380 करोड़ रुपये की आय हुई थी। झारखंड सरकार की चिंता केवल राजस्व तक सीमित नहीं है। राज्य का तर्क है कि खनिज संपदा झारखंड की जमीन से निकलती है और इससे जुड़े आर्थिक लाभ में राज्य की भूमिका और अधिकार सुनिश्चित रहना चाहिए। सरकार का मानना है कि यदि राज्यों की आय के स्रोत सीमित किए जाते हैं तो इसका असर विकास योजनाओं और जनकल्याणकारी कार्यक्रमों पर भी पड़ सकता है।

केंद्र के खिलाफ बड़े आंदोलन की चेतावनी
हेमंत सोरेन के बयान के बाद इस मुद्दे ने राजनीतिक रंग ले लिया है। मुख्यमंत्री ने केंद्र से विधेयक को वापस लेने की मांग करते हुए संकेत दिया है कि मांग नहीं मानी गई तो आंदोलन को बड़े स्तर पर ले जाया जा सकता है। सत्तारूढ़ झारखंड मुक्ति मोर्चा भी इस मुद्दे पर आक्रामक रुख अपना रहा है। पार्टी की ओर से इसे राज्यों के अधिकार और आर्थिक स्वायत्तता से जुड़ा विषय बताया जा रहा है। हालिया रिपोर्टों में JMM की ओर से देशव्यापी बड़े आंदोलन की तैयारी की बात कही गई है। राजनीतिक जानकारों की नजर अब इस बात पर है कि केंद्र और झारखंड सरकार के बीच बातचीत का रास्ता निकलता है या मामला सड़क से संसद तक बड़े राजनीतिक संघर्ष में बदलता है।

झारखंड को कितना नुकसान होने का दावा?
खनिज संशोधन विधेयक को लेकर झारखंड में सबसे बड़ी चिंता संभावित राजस्व नुकसान को लेकर है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, नए खनिज कानून से राज्य को लगभग 14,656 करोड़ रुपये के संभावित राजस्व नुकसान का अनुमान जताया गया है। हालांकि यह आंकड़ा राजनीतिक बहस और संबंधित आकलनों का हिस्सा है, इसलिए अंतिम आर्थिक प्रभाव कानून के लागू होने और उसके व्यावहारिक प्रावधानों के आधार पर स्पष्ट होगा। खनिज से मिलने वाला राजस्व झारखंड जैसे राज्य के लिए काफी महत्वपूर्ण है। राज्य में खनन से जुड़े इलाकों में सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और अन्य विकास योजनाओं के लिए संसाधनों की आवश्यकता रहती है। ऐसे में राज्य सरकार किसी भी ऐसे प्रावधान का विरोध कर रही है, जिससे उसके राजस्व स्रोतों पर दबाव बढ़ने की आशंका हो।

केंद्र सरकार का पक्ष भी महत्वपूर्ण
दूसरी तरफ केंद्र सरकार खनन क्षेत्र में सुधार, पारदर्शिता और महत्वपूर्ण खनिजों की खोज को बढ़ावा देने की बात करती रही है। खान और खनिज (विकास तथा विनियमन) संशोधन विधेयक, 2025 को संसद ने पारित किया था। आधिकारिक जानकारी के अनुसार, विधेयक का उद्देश्य महत्वपूर्ण और रणनीतिक खनिजों की उपलब्धता बढ़ाना, खनिज अन्वेषण को प्रोत्साहित करना और खनन क्षेत्र में कुछ नियामकीय बदलाव करना है। केंद्र सरकार की ओर से यह भी तर्क दिया गया है कि खनन क्षेत्र में सुधारों के माध्यम से देश को खनिजों के मामले में आत्मनिर्भर बनाया जा सकता है। महत्वपूर्ण खनिजों जैसे लिथियम, ग्रेफाइट, निकेल, कोबाल्ट, सोना और चांदी की खोज और उत्पादन को बढ़ावा देने पर भी जोर दिया जा रहा है।

अब आगे क्या होगा?
खनिज संशोधन विधेयक पर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की कड़ी आपत्ति के बाद आने वाले दिनों में झारखंड की राजनीति और गरमा सकती है। यदि केंद्र और राज्य के बीच सहमति नहीं बनती है तो यह मुद्दा संसद के साथ-साथ सड़क पर भी दिखाई दे सकता है।

झारखंड सरकार जहां इसे राज्य के अधिकार और आर्थिक हितों से जोड़ रही है, वहीं केंद्र सरकार इसे खनन क्षेत्र में व्यापक सुधार की दिशा में कदम बता रही है। ऐसे में आने वाले दिनों में दोनों पक्षों के बीच राजनीतिक और संवैधानिक बहस तेज होने की संभावना है।

फिलहाल मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की चेतावनी ने यह साफ कर दिया है कि झारखंड सरकार इस मुद्दे पर पीछे हटने के मूड में नहीं है। अब निगाहें केंद्र सरकार के अगले कदम पर हैं। यदि बिल वापस लेने की मांग स्वीकार नहीं होती है, तो मुख्यमंत्री द्वारा जिस बड़े आंदोलन की चेतावनी दी गई है, उसका स्वरूप और असर झारखंड की राजनीति के साथ राष्ट्रीय राजनीति पर भी दिखाई दे सकता है।


