By: Vikash Kumar Raut (Vicky)
नई दिल्ली। भारत और चीन के रिश्तों में लंबे समय से चली आ रही तल्खी के बीच चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग भारत पहुंच चुके हैं। जिनपिंग 12 सितंबर 2026 को नई दिल्ली पहुंचे, जहां वह 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में हिस्सा ले रहे हैं। इस दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शी जिनपिंग के बीच द्विपक्षीय मुलाकात भी होनी है। दोनों नेताओं की इस मुलाकात पर भारत और चीन के साथ-साथ पूरी दुनिया की नजर है, क्योंकि यह बैठक ऐसे समय में हो रही है जब दोनों देश अपने संबंधों को धीरे-धीरे सामान्य करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।

मोदी-जिनपिंग मुलाकात से ठीक पहले चीन ने भारत के साथ अपने रिश्तों को लेकर एक महत्वपूर्ण बयान दिया है। चीन ने कहा है कि दोनों देशों को द्विपक्षीय संबंधों को रणनीतिक और दीर्घकालिक नजरिए से देखना चाहिए। साथ ही दोनों देशों के बीच बातचीत और सहयोग को बढ़ाने तथा मतभेदों को उचित तरीके से संभालने पर जोर दिया गया है। चीन के विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता माओ निंग ने कहा कि बीजिंग भारत के साथ संवाद मजबूत करने, सहयोग बढ़ाने और मतभेदों को सही तरीके से प्रबंधित करने के लिए काम करेगा।

चीन का यह बयान इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि भारत और चीन के संबंधों में पिछले कुछ वर्षों के दौरान सीमा विवाद सबसे बड़ा मुद्दा रहा है। वर्ष 2020 में पूर्वी लद्दाख में हुई हिंसक झड़प के बाद दोनों देशों के रिश्तों में गंभीर तनाव पैदा हो गया था। इसके बाद सीमा पर सैन्य तैनाती बढ़ी और दोनों देशों के बीच राजनीतिक तथा आर्थिक संबंधों पर भी इसका असर पड़ा। अब दोनों पक्षों की ओर से बातचीत और संपर्क बढ़ाने की कोशिशें लगातार देखने को मिल रही हैं।

चीन के ताजा बयान में केवल मतभेदों को संभालने की बात नहीं कही गई, बल्कि दोनों देशों को अच्छे पड़ोसी और एक-दूसरे की सफलता में मदद करने वाले साझेदार के रूप में आगे बढ़ने का संदेश भी दिया गया है। चीन का कहना है कि भारत और चीन को रणनीतिक स्तर से अपने संबंधों को देखना चाहिए और संवाद तथा सहयोग को मजबूत करना चाहिए।
दरअसल, भारत और चीन के बीच पिछले कुछ समय में उच्चस्तरीय संपर्क बढ़ा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शी जिनपिंग की मुलाकातें कजान और तियानजिन जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर हो चुकी हैं। भारत सरकार ने भी पहले यह स्पष्ट किया है कि दोनों देशों के संबंधों में स्थिरता के लिए सीमा क्षेत्रों में शांति और सौहार्द जरूरी है। अगस्त 2025 में तियानजिन में मोदी और जिनपिंग की बैठक के दौरान दोनों नेताओं ने इस बात पर जोर दिया था कि मतभेदों को विवाद में बदलने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।

अब नई दिल्ली में होने वाली मोदी-जिनपिंग बैठक को इसी प्रक्रिया की अगली कड़ी के तौर पर देखा जा रहा है। हालांकि, यह कहना जल्दबाजी होगी कि इस बैठक से भारत-चीन संबंधों में अचानक बड़ा बदलाव आ जाएगा। दोनों देशों के बीच सीमा विवाद, व्यापार असंतुलन, बाजार तक पहुंच, निवेश और रणनीतिक सुरक्षा जैसे कई मुद्दे अभी भी मौजूद हैं। ऐसे में दोनों नेताओं के बीच बातचीत का मुख्य उद्देश्य रिश्तों को स्थिर रखना और विवादित मुद्दों पर संवाद का रास्ता खुला रखना हो सकता है।
भारत के लिए सीमा पर शांति और सुरक्षा सबसे अहम मुद्दों में से एक है। भारत लगातार यह रुख रखता आया है कि सीमा पर शांति के बिना द्विपक्षीय संबंधों को पूरी तरह सामान्य करना मुश्किल होगा। दूसरी तरफ चीन भी अब सार्वजनिक तौर पर बातचीत और मतभेदों के उचित प्रबंधन की बात कर रहा है। इससे संकेत मिलता है कि दोनों देश टकराव के बजाय संवाद के जरिए अपने संबंधों को संभालने की कोशिश कर रहे हैं।

आर्थिक मोर्चे पर भी भारत और चीन के बीच रिश्ते काफी महत्वपूर्ण हैं। चीन भारत के प्रमुख व्यापारिक साझेदारों में शामिल है और भारत की कई औद्योगिक तथा विनिर्माण आपूर्ति श्रृंखलाएं चीनी उत्पादों और कच्चे माल से जुड़ी हैं। वहीं भारत लगातार व्यापार असंतुलन और बाजार तक बेहतर पहुंच जैसे मुद्दे उठाता रहा है। ऐसे में दोनों नेताओं के बीच बातचीत आर्थिक सहयोग को लेकर भी महत्वपूर्ण हो सकती है। रणनीतिक आर्थिक संवाद और व्यापार से जुड़े मुद्दों पर चर्चा की संभावनाएं भी सामने आई हैं।

ब्रिक्स शिखर सम्मेलन का मंच भी इस मुलाकात को और महत्वपूर्ण बनाता है। भारत इस वर्ष ब्रिक्स की मेजबानी कर रहा है और चीन इस समूह का एक प्रमुख सदस्य है। दोनों देश वैश्विक दक्षिण, बहुपक्षीय व्यवस्था और आर्थिक सहयोग जैसे मुद्दों पर कई क्षेत्रों में समान हित रखते हैं। चीन ने भी ब्रिक्स को उभरती अर्थव्यवस्थाओं और विकासशील देशों के बीच सहयोग का महत्वपूर्ण मंच बताया है।

विशेषज्ञों की नजर अब इस बात पर है कि मोदी और जिनपिंग की बातचीत केवल औपचारिक मुलाकात तक सीमित रहती है या इसके जरिए भारत-चीन संबंधों को आगे बढ़ाने के लिए कोई ठोस दिशा तय होती है। चीन की ओर से मतभेदों को सही तरीके से संभालने और बातचीत बढ़ाने का संदेश निश्चित रूप से सकारात्मक संकेत माना जा सकता है, लेकिन भारत के लिए इस संदेश की वास्तविक अहमियत इस बात पर निर्भर करेगी कि जमीनी स्तर पर सीमा और अन्य विवादित मुद्दों को लेकर क्या प्रगति होती है।

कुल मिलाकर, मोदी-जिनपिंग मुलाकात भारत और चीन के रिश्तों के लिए एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक अवसर है। चीन का ताजा बयान संकेत देता है कि बीजिंग टकराव को कम करके संवाद और सहयोग का रास्ता मजबूत करना चाहता है। भारत भी स्थिर और शांतिपूर्ण संबंधों के लिए बातचीत के पक्ष में रहा है, लेकिन साथ ही सीमा सुरक्षा और राष्ट्रीय हितों को लेकर अपनी प्राथमिकताएं स्पष्ट रखता है। ऐसे में आने वाले समय में सबसे बड़ा सवाल यही होगा कि दोनों देशों के बीच बढ़ता संवाद क्या वास्तविक विश्वास में बदल पाता है और क्या मतभेदों को संभालने के साथ-साथ लंबे समय से लंबित मुद्दों पर ठोस समाधान की दिशा में कदम बढ़ते हैं।

