By: Mala Mandal
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत की अर्थव्यवस्था के लिए आए मजबूत GDP आंकड़ों पर खुशी जाहिर करते हुए देशवासियों से एक बार फिर स्वदेशी और आत्मनिर्भर भारत को बढ़ावा देने की अपील की है। मंगलवार को प्रधानमंत्री ने FY27 यानी वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में भारत की 7.8 फीसदी GDP ग्रोथ का उल्लेख करते हुए कहा कि देश को विकास की इस रफ्तार को बनाए रखना होगा। इसी दौरान उन्होंने लोगों से अनावश्यक विदेशी खर्च से बचने और जरूरत न होने पर सोना नहीं खरीदने की अपील की। प्रधानमंत्री की इस अपील ने आर्थिक और राजनीतिक दोनों स्तरों पर चर्चा को तेज कर दिया है। भारत में सोना सिर्फ निवेश का माध्यम नहीं बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक जरूरत से भी जुड़ा हुआ है। ऐसे में प्रधानमंत्री का यह कहना कि जरूरत न हो तो सोना खरीदने से बचें, कई लोगों के लिए महत्वपूर्ण संदेश माना जा रहा है।

7.8 फीसदी GDP ग्रोथ के बीच क्यों दिया स्वदेशी का मंत्र?
राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय की ओर से जारी आंकड़ों के मुताबिक अप्रैल-जून 2026 की तिमाही में भारत की वास्तविक GDP वृद्धि दर 7.8 फीसदी रही। यह आंकड़ा उम्मीद से बेहतर रहा और भारत की अर्थव्यवस्था की मजबूती को दर्शाने वाला माना गया। प्रधानमंत्री मोदी ने इस उपलब्धि के लिए देशवासियों को बधाई दी और कहा कि वैश्विक स्तर पर युद्ध, अस्थिरता, सप्लाई चेन में व्यवधान और आर्थिक अनिश्चितताओं के बावजूद भारत ने विकास की गति बनाए रखी है। प्रधानमंत्री का तर्क है कि अगर भारत को विकास की इस रफ्तार को लंबे समय तक बनाए रखना है तो देश को आत्मनिर्भर बनना होगा। इसके लिए स्थानीय उत्पादों और सेवाओं को प्राथमिकता देना तथा ऐसे खर्चों को कम करना जरूरी है, जिनसे देश से विदेशी मुद्रा बाहर जाती है।

सोना खरीदने से क्यों बचने की अपील?
भारत दुनिया के बड़े सोना आयातक देशों में शामिल है। देश में सोने की बड़ी मांग को पूरा करने के लिए काफी मात्रा में सोना विदेशों से आयात किया जाता है। ऐसे में जब भारतीय नागरिक सोना खरीदते हैं, तो इसका एक हिस्सा विदेशी मुद्रा के जरिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में भुगतान के रूप में जाता है। Business Standard की रिपोर्ट के मुताबिक अप्रैल-जुलाई 2026 के दौरान भारत का सोना आयात 32.4 फीसदी बढ़कर 15.2 अरब डॉलर हो गया था। ऐसे में सरकार की चिंता यह है कि अनावश्यक सोने की खरीद और अन्य विदेशी खर्चों को कम करके विदेशी मुद्रा पर दबाव घटाया जा सकता है। यही वजह है कि प्रधानमंत्री ने यह नहीं कहा कि देशवासी हर परिस्थिति में सोना खरीदना पूरी तरह बंद कर दें। उनका संदेश खास तौर पर अनावश्यक खरीदारी से बचने पर केंद्रित है।

क्या सोना खरीदना हमेशा गलत है?
यहां प्रधानमंत्री की अपील और व्यक्तिगत निवेश के बीच अंतर समझना जरूरी है। सोना भारतीय परिवारों के लिए लंबे समय से बचत और संपत्ति का एक महत्वपूर्ण माध्यम रहा है। शादी, धार्मिक अवसरों और पारिवारिक परंपराओं में भी इसकी भूमिका है। इसलिए ‘जरूरत न हो तो सोना न खरीदें’ को एक सामान्य आर्थिक सलाह के तौर पर देखा जा सकता है, न कि हर व्यक्ति के लिए सोने में निवेश पूरी तरह बंद करने की सलाह के रूप में। अगर किसी व्यक्ति को शादी, पारिवारिक कार्यक्रम या किसी वास्तविक जरूरत के लिए सोना खरीदना है, तो वह अपनी जरूरत और बजट के हिसाब से फैसला कर सकता है। वहीं केवल दिखावे, भावनात्मक खरीदारी या बिना जरूरत बड़ी मात्रा में सोना खरीदने से बचना व्यक्तिगत वित्त के लिहाज से भी समझदारी हो सकती है।

स्वदेशी और ‘वोकल फॉर लोकल’ पर जोर
प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संदेश में केवल सोने की खरीद को लेकर बात नहीं की। उन्होंने Swadeshi, Vocal for Local और Atmanirbhar Bharat की सोच को आगे बढ़ाने पर जोर दिया। उन्होंने लोगों से विदेशों में छुट्टियां मनाने के बजाय भारत में पर्यटन को बढ़ावा देने और विदेशों में शादी करने के बजाय देश में ही विवाह समारोह आयोजित करने की अपील भी की। इसका उद्देश्य देश के भीतर खर्च को बढ़ाना और स्थानीय कारोबार, होटल, पर्यटन, परिवहन तथा दूसरे सेवा क्षेत्रों को लाभ पहुंचाना है। प्रधानमंत्री के मुताबिक जब भारतीय उपभोक्ता देश में बने सामान और देश के भीतर उपलब्ध सेवाओं पर खर्च करते हैं, तो उसका लाभ भारतीय कारोबार और रोजगार को मिल सकता है।

विदेशी मुद्रा और अर्थव्यवस्था का कनेक्शन
भारत कच्चे तेल, उर्वरक और कई अन्य जरूरी वस्तुओं के लिए आयात पर निर्भर है। ऐसे में देश को लगातार विदेशी मुद्रा की जरूरत रहती है। वैश्विक तनाव और युद्ध जैसी परिस्थितियों में तेल और दूसरी जरूरी वस्तुओं की कीमतों में बदलाव भारत की अर्थव्यवस्था पर दबाव डाल सकता है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भी इस संदर्भ में कहा है कि भारत कच्चे तेल और उर्वरकों का बड़ा आयातक है और मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों में विदेशी मुद्रा खर्च को लेकर सावधानी जरूरी है। इसी व्यापक आर्थिक परिस्थिति में प्रधानमंत्री का सोने और अनावश्यक विदेशी खर्च को लेकर दिया गया संदेश देखा जा रहा है।

क्या इससे आम लोगों पर असर पड़ेगा?
प्रधानमंत्री की अपील का सबसे बड़ा असर लोगों के खरीदारी व्यवहार और बाजार की धारणा पर पड़ सकता है। सोने की मांग में अगर लंबे समय तक कमी आती है तो इसका असर ज्वेलरी कारोबार, सोने के आयात और इससे जुड़े व्यापार पर पड़ सकता है। प्रधानमंत्री की अपील के बाद ज्वेलरी कंपनियों के शेयरों में भी बाजार की प्रतिक्रिया देखने को मिली। हालांकि शेयर बाजार में किसी एक बयान के कारण होने वाले उतार-चढ़ाव को स्थायी आर्थिक प्रभाव नहीं माना जा सकता। दूसरी ओर, अगर लोग अपनी बचत का पैसा सोने की बजाय दूसरे वित्तीय साधनों या घरेलू वस्तुओं और सेवाओं पर खर्च करते हैं, तो इससे अर्थव्यवस्था के अलग-अलग क्षेत्रों को फायदा मिल सकता है।

GDP की मजबूत रफ्तार और आगे की चुनौती
7.8 फीसदी की GDP वृद्धि निश्चित रूप से भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए सकारात्मक संकेत है। लेकिन मजबूत GDP ग्रोथ के साथ रोजगार, आय, महंगाई, ग्रामीण मांग और आम आदमी की क्रय शक्ति जैसे मुद्दे भी महत्वपूर्ण हैं। सरकार जहां मजबूत GDP आंकड़ों को भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती के प्रमाण के रूप में देख रही है, वहीं विपक्ष ने GDP आंकड़ों और उनके आम लोगों तक पहुंचने वाले लाभ को लेकर सवाल उठाए हैं। ऐसे में प्रधानमंत्री की स्वदेशी अपील को केवल सोना खरीदने से जुड़ा बयान मानना पर्याप्त नहीं होगा। यह सरकार की उस व्यापक आर्थिक सोच का हिस्सा है, जिसमें घरेलू उत्पादन, स्थानीय कारोबार और भारत के भीतर खर्च को बढ़ावा देने पर जोर दिया जा रहा है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ‘जरूरत न हो तो सोना न खरीदें’ वाली अपील का मुख्य उद्देश्य अनावश्यक आयात और विदेशी मुद्रा के खर्च को कम करना तथा भारतीय अर्थव्यवस्था में घरेलू मांग को मजबूत करना है। भारत की 7.8 फीसदी GDP वृद्धि के बीच दिया गया यह संदेश स्वदेशी और आत्मनिर्भर भारत की नीति से भी जुड़ा हुआ है।
हालांकि, सोना भारतीय परिवारों की आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसलिए इसे पूरी तरह खरीदना बंद करने के बजाय प्रधानमंत्री की अपील को अनावश्यक खरीदारी से बचने और जरूरत के मुताबिक खर्च करने के संदेश के रूप में देखना ज्यादा उचित होगा।

अब सवाल यह है कि क्या देशवासी इस अपील को केवल एक राजनीतिक संदेश के तौर पर लेते हैं या वास्तव में अपनी खरीदारी और निवेश की आदतों में बदलाव करते हैं। इसका असर आने वाले महीनों में सोने की मांग, आयात और घरेलू बाजार के आंकड़ों में दिखाई दे सकता है।

