By: Vikash Kumar Raut (Vicky)
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत की जलवायु नीति और पर्यावरण संरक्षण को लेकर देश की उपलब्धियों का जिक्र करते हुए कहा कि प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन के मामले में भारत आज भी वैश्विक औसत के आधे से कम स्तर पर है। उन्होंने कहा कि विकसित देशों में भारत की तुलना में प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन करीब छह गुना अधिक है। प्रधानमंत्री ने यह बात नई दिल्ली के विज्ञान भवन में आयोजित ‘द फ्यूचर ऑफ एनवायरनमेंट एंड क्लाइमेट डायनेमिक्स’ विषय पर अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के दौरान कही।

विकसित देशों पर PM मोदी की टिप्पणी
प्रधानमंत्री मोदी ने जलवायु परिवर्तन की वैश्विक बहस में विकासशील देशों की भूमिका को लेकर कहा कि अक्सर कार्बन उत्सर्जन की जिम्मेदारी विकासशील देशों पर डाल दी जाती है। उन्होंने कहा कि आंकड़ों को देखने पर तस्वीर अलग दिखाई देती है। प्रधानमंत्री के मुताबिक, भारत का प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन वैश्विक औसत के आधे से भी कम है, जबकि विकसित देशों में यह भारत की तुलना में करीब छह गुना अधिक है। प्रधानमंत्री ने इसे जलवायु न्याय से जुड़े भारत के रुख के संदर्भ में भी रखा। भारत लंबे समय से जलवायु कार्रवाई में ‘समानता’ और देशों की अलग-अलग ऐतिहासिक जिम्मेदारियों की बात करता रहा है। भारत का तर्क रहा है कि विकासशील देशों को विकास की जरूरतों के साथ जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए पर्याप्त अवसर भी मिलना चाहिए।

हालांकि, जलवायु परिवर्तन की चुनौती केवल प्रति व्यक्ति उत्सर्जन के आंकड़ों तक सीमित नहीं है। कुल उत्सर्जन, ऐतिहासिक उत्सर्जन, आर्थिक विकास, ऊर्जा की मांग और भविष्य की उत्सर्जन वृद्धि जैसे कई दूसरे संकेतक भी वैश्विक जलवायु नीति में महत्वपूर्ण माने जाते हैं। इसलिए अलग-अलग देशों की तुलना करते समय आंकड़ों का संदर्भ समझना जरूरी है।
भारत ने पेरिस समझौते के लक्ष्यों को लेकर क्या हासिल किया?
प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि भारत ने पेरिस समझौते के तहत तय किए गए कुछ प्रमुख जलवायु लक्ष्यों को निर्धारित समय से पहले हासिल किया है। सरकार के अनुसार, भारत ने जून 2025 में अपनी कुल स्थापित बिजली क्षमता का 50 प्रतिशत से अधिक गैर-जीवाश्म ईंधन स्रोतों से हासिल कर लिया था। यह लक्ष्य भारत के 2030 के राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान यानी NDC में शामिल था और सरकार के अनुसार इसे समय से करीब पांच साल पहले हासिल किया गया।

सरकार के अगस्त 2026 के आंकड़ों के मुताबिक, 30 जून 2026 तक भारत की कुल स्थापित बिजली क्षमता में गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित स्रोतों की हिस्सेदारी 54.18 प्रतिशत हो चुकी थी। वहीं, 2022 में भारत ने 2005 के स्तर की तुलना में अपनी GDP की उत्सर्जन तीव्रता में 37.38 प्रतिशत की कमी हासिल की थी। यहां यह समझना जरूरी है कि ‘उत्सर्जन तीव्रता’ और कुल कार्बन उत्सर्जन एक ही चीज नहीं हैं। उत्सर्जन तीव्रता का मतलब अर्थव्यवस्था के आकार के मुकाबले होने वाले उत्सर्जन से है। किसी देश की अर्थव्यवस्था बढ़ने के साथ उत्सर्जन तीव्रता कम हो सकती है, जबकि कुल उत्सर्जन में अलग-अलग परिस्थितियों में वृद्धि भी हो सकती है।

12 साल में सौर ऊर्जा क्षमता में बड़ा विस्तार
प्रधानमंत्री ने भारत की सौर ऊर्जा क्षमता में हुए विस्तार को भी रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि करीब 12 साल पहले देश की सौर ऊर्जा क्षमता लगभग 2 गीगावाट थी, जो अब 160 गीगावाट से अधिक हो चुकी है। सरकार के जुलाई 2026 के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, 31 जुलाई 2026 तक भारत की स्थापित सौर ऊर्जा क्षमता 164.59 गीगावाट पहुंच चुकी थी। यह 2014 में दर्ज लगभग 2.8 गीगावाट की क्षमता से कई गुना अधिक है। सौर ऊर्जा के विस्तार के साथ सरकार ने घरों की छतों पर सोलर सिस्टम लगाने पर भी जोर दिया है। प्रधानमंत्री सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना के तहत लाखों घरों में रूफटॉप सोलर सिस्टम लगाए जा चुके हैं। सरकार के अनुसार, अगस्त 2026 तक 51.58 लाख से अधिक घर इस योजना के तहत रूफटॉप सोलर से लाभान्वित हो चुके थे।

भारत के सामने आगे की चुनौती
भारत ने जहां गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता और सौर ऊर्जा में तेजी से विस्तार किया है, वहीं देश की बढ़ती ऊर्जा जरूरतें भी एक बड़ी चुनौती हैं। तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था, शहरीकरण और औद्योगिकीकरण के साथ बिजली और ईंधन की मांग लगातार बढ़ रही है। इसी वजह से भारत ने आने वाले वर्षों के लिए भी नए जलवायु लक्ष्य निर्धारित किए हैं। मार्च 2026 में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 2031-2035 की अवधि के लिए भारत के नए NDC को मंजूरी दी। इसके तहत 2035 तक GDP की उत्सर्जन तीव्रता को 2005 के स्तर से 47 प्रतिशत कम करने और बिजली की स्थापित क्षमता में गैर-जीवाश्म ईंधन की हिस्सेदारी को 60 प्रतिशत तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है। इसके अलावा वन एवं वृक्ष आवरण के जरिए 3.5 से 4 अरब टन CO₂ समकक्ष का अतिरिक्त कार्बन सिंक बनाने का लक्ष्य भी रखा गया है।

भारत ने वर्ष 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन का दीर्घकालिक लक्ष्य भी रखा है। प्रधानमंत्री मोदी ने 2021 में ग्लासगो में भारत के ‘पंचामृत’ लक्ष्यों की घोषणा करते हुए 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता और अर्थव्यवस्था की कार्बन तीव्रता में 45 प्रतिशत से अधिक की कमी जैसे लक्ष्य सामने रखे थे।
जलवायु न्याय पर भारत का जोर
प्रधानमंत्री के भाषण का एक महत्वपूर्ण हिस्सा ‘क्लाइमेट जस्टिस’ यानी जलवायु न्याय पर केंद्रित रहा। भारत का कहना है कि जलवायु परिवर्तन की जिम्मेदारी तय करते समय प्रति व्यक्ति उत्सर्जन और ऐतिहासिक उत्सर्जन जैसे पहलुओं को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। भारत की स्थिति यह रही है कि विकासशील देशों को अपनी अर्थव्यवस्था और जीवन स्तर में सुधार के लिए ऊर्जा की जरूरत है, इसलिए जलवायु कार्रवाई में सभी देशों की जिम्मेदारियों को उनकी परिस्थितियों के अनुसार देखा जाना चाहिए। वहीं, विकसित देशों की ओर से वैश्विक उत्सर्जन कम करने के लिए अधिक महत्वाकांक्षी कदम उठाने की मांग भी अंतरराष्ट्रीय जलवायु वार्ताओं का हिस्सा रही है।

PM मोदी के बयान का क्या मतलब है?
PM मोदी की टिप्पणी को व्यापक रूप से भारत के जलवायु कूटनीति वाले रुख के संदर्भ में देखा जा सकता है। एक तरफ भारत अपनी प्रति व्यक्ति उत्सर्जन स्थिति और नवीकरणीय ऊर्जा में तेजी से बढ़ती क्षमता को अपनी जलवायु कार्रवाई के प्रमाण के रूप में पेश कर रहा है। दूसरी तरफ भारत के सामने आर्थिक विकास के साथ ऊर्जा जरूरतों और उत्सर्जन को संतुलित करने की चुनौती बनी हुई है।

इसलिए भारत की जलवायु यात्रा का मूल्यांकन केवल एक आंकड़े से नहीं किया जा सकता। प्रति व्यक्ति उत्सर्जन, कुल उत्सर्जन, उत्सर्जन तीव्रता, गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता, नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन और भविष्य के जलवायु लक्ष्यों को एक साथ देखकर तस्वीर अधिक स्पष्ट होती है।
फिलहाल, सौर ऊर्जा में तेजी से बढ़ती क्षमता और गैर-जीवाश्म बिजली क्षमता में विस्तार भारत की ऊर्जा नीति में बड़े बदलाव को दर्शाते हैं। वहीं 2035 और 2070 के लक्ष्यों को हासिल करने के लिए आने वाले वर्षों में नवीकरणीय ऊर्जा के विस्तार, ऊर्जा दक्षता, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी, हरित हाइड्रोजन और कार्बन सिंक जैसे क्षेत्रों में लगातार काम करना महत्वपूर्ण होगा।

