By: Vikash Kumar Raut (Vicky)
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ पढ़ाई कर चुके 81 वर्षीय असगर अली वोरा से जुड़ा भायंदर का लंबे समय से चला आ रहा जमीन विवाद अब एक नए मोड़ पर पहुंच गया है। मीरा रोड निवासी असगर अली वोरा ने 8 सितंबर 2026 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात कर अपनी जमीन से जुड़े विवाद की जानकारी दी थी। इसके कुछ ही दिनों बाद विवादित जमीन को लेकर प्रशासनिक स्तर पर बैठक हुई और जमीन से जुड़े पक्ष की ओर से कब्जा छोड़ने तथा निर्माण अनुमति वापस करने की घोषणा की गई। इस घटनाक्रम के बाद करीब 15 साल पुराने इस विवाद को लेकर चर्चा तेज हो गई है।

पीएम मोदी के पुराने स्कूलमेट हैं असगर अली वोरा
असगर अली वोरा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुजरात के वडनगर स्थित बीएन स्कूल में साथ पढ़ाई की थी। 81 वर्षीय वोरा मीरा रोड में रहते हैं। रिपोर्टों के मुताबिक, वह लंबे समय से भायंदर ईस्ट के नवघर इलाके में स्थित अपनी जमीन को लेकर विवाद का सामना कर रहे थे। वोरा के मुताबिक, उन्होंने वर्ष 1989 में करीब 2,810 वर्ग मीटर जमीन खरीदी थी। उनका दावा है कि उन्होंने यह जमीन न तो बेची और न ही किसी अन्य व्यक्ति को हस्तांतरित की। हालांकि, बाद में इस जमीन के स्वामित्व और कब्जे को लेकर विवाद खड़ा हो गया।

2011 से चला आ रहा था विवाद
असगर अली वोरा ने आरोप लगाया था कि वर्ष 2011 में उनकी जमीन पर कब्जा किया गया। उन्होंने इस मामले में स्वयं बिल्डर्स और सेवन इलेवन कंस्ट्रक्शंस से जुड़े लोगों पर आरोप लगाए। वोरा का यह भी दावा रहा है कि जमीन से संबंधित दस्तावेजों में गड़बड़ी की गई और संपत्ति को अलग-अलग हिस्सों में बांटा गया। हालांकि, इन आरोपों को संबंधित कानूनी प्रक्रिया और दस्तावेजों के संदर्भ में ही देखा जाना चाहिए। रिपोर्टों के अनुसार, इस विवाद को लेकर पहले भी पुलिस और प्रशासनिक स्तर पर शिकायतें की गई थीं तथा मामला अदालत तक पहुंच चुका था।

8 सितंबर को पीएम मोदी से हुई मुलाकात
लंबे समय तक सरकारी विभागों के चक्कर लगाने के बाद असगर अली वोरा ने 8 सितंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की। उन्होंने प्रधानमंत्री के सामने अपनी जमीन से जुड़ा मामला रखा और हस्तक्षेप की मांग की। रिपोर्टों के अनुसार, वोरा ने मामले की जांच की मांग भी की थी। मुलाकात के बाद संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों की सक्रियता बढ़ी। महाराष्ट्र मंत्रालय में मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव श्रीकर परदेशी की अध्यक्षता में एक बैठक हुई, जिसमें असगर अली वोरा, नरेंद्र मेहता तथा मीरा-भायंदर नगर निगम के अधिकारी शामिल हुए।

विवादित जमीन से कब्जा छोड़ने का ऐलान
बैठक के दौरान सेवन इलेवन कंस्ट्रक्शंस की ओर से टाउन प्लानिंग विभाग को पत्र दिया गया। इसमें विवादित जमीन से कब्जा छोड़ने और पहले मिली निर्माण अनुमति को वापस करने की बात कही गई। कंपनी ने निर्माण अनुमति के लिए जमा किए गए शुल्क की वापसी की मांग भी की है। इसके अलावा पुलिस आयुक्त को भेजे गए एक अलग पत्र में असगर अली वोरा के खिलाफ पहले दर्ज की गई शिकायत वापस लेने की बात भी सामने आई है। संबंधित पक्ष ने दोनों पक्षों के बीच समझौते का उल्लेख किया है।

जमीन विवाद में अब आगे क्या होगा?
इस पूरे घटनाक्रम के बाद यह सवाल भी महत्वपूर्ण है कि जमीन का कानूनी स्वामित्व और कब्जा आधिकारिक रिकॉर्ड में किस तरह दर्ज होता है। केवल कब्जा छोड़ने या निर्माण अनुमति वापस लेने से जमीन के स्वामित्व से जुड़े सभी कानूनी प्रश्न स्वतः समाप्त नहीं हो जाते। ऐसे मामलों में राजस्व रिकॉर्ड, रजिस्टर्ड दस्तावेज, अदालत के आदेश और संबंधित प्रशासनिक कार्रवाई महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, जनवरी 2026 में एक सिविल कोर्ट के फैसले में वोरा के कुछ अधिकारों को बरकरार रखा गया था, लेकिन उन्हें पूरी जमीन का मालिक घोषित नहीं किया गया था। इसलिए आगे की कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रिया इस मामले में महत्वपूर्ण रहेगी।

पीएम मोदी से मुलाकात के बाद क्यों चर्चा में आया मामला?
इस मामले की सबसे खास बात यह है कि लंबे समय से चल रहे विवाद में पीएम मोदी से मुलाकात के कुछ ही दिनों बाद संबंधित पक्ष की ओर से जमीन से कब्जा छोड़ने और निर्माण अनुमति वापस लेने की घोषणा हुई। इसी वजह से यह मामला राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आया है। हालांकि, उपलब्ध रिपोर्टों से यह निश्चित रूप से निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि जमीन का समाधान केवल प्रधानमंत्री की व्यक्तिगत पहल के कारण हुआ। रिपोर्टों में मुलाकात के बाद प्रशासनिक बैठक और संबंधित पक्ष की ओर से लिखित कार्रवाई का क्रम सामने आया है। इसलिए घटनाक्रम को इसी तथ्यात्मक क्रम में देखना अधिक उचित है।

करीब 15 साल की लड़ाई के बाद मिली राहत
असगर अली वोरा के लिए यह मामला केवल जमीन से जुड़ा विवाद नहीं, बल्कि वर्षों से चली आ रही कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रिया का विषय रहा है। वह लंबे समय से विभिन्न सरकारी एजेंसियों के सामने अपनी शिकायत रखते रहे थे।
अब संबंधित निर्माण कंपनी की ओर से कब्जा छोड़ने और निर्माण अनुमति वापस करने की बात सामने आने के बाद उन्हें बड़ी राहत मिली है। हालांकि, जमीन के अंतिम कानूनी अधिकार और रिकॉर्ड से जुड़े सभी पहलुओं पर आगे की आधिकारिक प्रक्रिया और न्यायिक स्थिति पर नजर रखना महत्वपूर्ण होगा।

निष्कर्ष: असगर अली वोरा और पीएम मोदी की मुलाकात के बाद भायंदर जमीन विवाद में जिस तरह प्रशासनिक स्तर पर गतिविधियां तेज हुईं और संबंधित कंपनी ने कब्जा तथा निर्माण अनुमति छोड़ने की बात कही, उसने करीब 15 साल पुराने मामले को नया मोड़ दिया है। अब आगे की कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रिया यह स्पष्ट करेगी कि जमीन के स्वामित्व से जुड़े सभी पहलुओं का अंतिम समाधान किस तरह होता है।

