By: Mala Mandal
भारत में डिजिटल पेमेंट की तस्वीर बदलने वाली है। UPI यानी Unified Payments Interface के जरिए भुगतान करने वाले करोड़ों लोगों के लिए आने वाले समय में शुल्क से जुड़ा बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने डिजिटल पेमेंट से जुड़े संशोधन कानून को मंजूरी दे दी है। इसके साथ ही UPI और RuPay जैसे इलेक्ट्रॉनिक पेमेंट माध्यमों पर Merchant Discount Rate यानी MDR लागू करने का कानूनी रास्ता साफ हो गया है। हालांकि, यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है। राष्ट्रपति की मंजूरी का मतलब यह नहीं है कि आज से हर UPI पेमेंट पर शुल्क लगना शुरू हो गया है। संशोधन के बाद सरकार के लिए भविष्य में नियम बनाकर कुछ डिजिटल ट्रांजैक्शन पर शुल्क की व्यवस्था लागू करने का रास्ता खुला है। शुल्क कितना होगा, किन लेन-देन पर लगेगा और इसका बोझ व्यापारी उठाएंगे या ग्राहक—इन मुद्दों पर आगे की अधिसूचना और नियम महत्वपूर्ण होंगे।

क्या है MDR और क्यों हो रही है इसकी चर्चा?
MDR यानी Merchant Discount Rate वह शुल्क है जो डिजिटल भुगतान को प्रोसेस करने के लिए भुगतान व्यवस्था में शामिल संस्थाओं को दिया जाता है। इसमें बैंक, पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर और अन्य संबंधित संस्थाएं शामिल हो सकती हैं। UPI के तेजी से विस्तार के बावजूद लंबे समय से इसके इस्तेमाल पर MDR नहीं लगाया जा रहा था। जनवरी 2020 से UPI और RuPay डेबिट कार्ड पर MDR को शून्य रखा गया था, जिसका उद्देश्य डिजिटल भुगतान को तेजी से बढ़ावा देना था। लेकिन UPI के इस्तेमाल में जबरदस्त बढ़ोतरी के साथ इसके इंफ्रास्ट्रक्चर और संचालन की लागत भी बढ़ी है। वित्त मामलों की संसदीय समिति ने भी UPI सिस्टम की वित्तीय स्थिरता को लेकर चिंता जताई थी और एक टिकाऊ राजस्व मॉडल की जरूरत बताई थी।

क्या हर UPI पेमेंट पर लगेगा चार्ज?
फिलहाल ऐसा कहना सही नहीं होगा कि हर व्यक्ति को हर UPI ट्रांजैक्शन पर शुल्क देना पड़ेगा। मौजूदा चर्चा मुख्य रूप से बड़े व्यापारियों और अधिक मूल्य वाले डिजिटल लेन-देन पर MDR लागू करने की संभावनाओं को लेकर है। कुछ प्रस्तावों में ₹2,000 से अधिक के ट्रांजैक्शन और बड़े कारोबार वाले व्यापारियों को संभावित शुल्क व्यवस्था के दायरे में लाने की बात सामने आई है। Reuters की रिपोर्ट के मुताबिक संभावित MDR 0.3% से 0.5% के बीच हो सकता है, हालांकि अंतिम दर और नियम अभी निश्चित नहीं माने जा सकते। इसका मतलब यह हुआ कि छोटे दुकानदार या आम ग्राहक द्वारा रोजमर्रा की छोटी खरीदारी के लिए किए जाने वाले UPI भुगतान पर तत्काल कोई नया शुल्क लगना जरूरी नहीं है। अंतिम तस्वीर सरकार की अधिसूचना के बाद ही स्पष्ट होगी।

आम लोगों पर क्या होगा असर?
UPI आज भारत में रोजमर्रा की जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है। सब्जी खरीदने से लेकर ऑनलाइन शॉपिंग, बिजली बिल, मोबाइल रिचार्ज और दुकानों पर भुगतान तक लोग UPI का इस्तेमाल करते हैं। अगर भविष्य में सीधे ग्राहक से शुल्क वसूला जाता है तो इसका असर करोड़ों छोटे-बड़े डिजिटल पेमेंट यूजर्स पर पड़ सकता है। लेकिन यदि MDR केवल व्यापारियों से लिया जाता है, तो आम ग्राहक को सीधे भुगतान करते समय अतिरिक्त रकम नहीं देनी पड़ सकती। यही वजह है कि UPI चार्ज की चर्चा के बीच सबसे बड़ा सवाल यह है कि शुल्क का अंतिम बोझ किस पर पड़ेगा। अगर व्यापारी पर शुल्क लगता है तो कुछ कारोबारी अपनी लागत की भरपाई के लिए ग्राहकों से अतिरिक्त रकम मांगने की कोशिश कर सकते हैं। ऐसे मामलों में सरकार और नियामक की भूमिका महत्वपूर्ण होगी।

सरकार और डिजिटल पेमेंट कंपनियों के सामने क्या चुनौती है?
UPI को लगातार बढ़ाने के लिए मजबूत डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर, बैंकिंग सिस्टम, साइबर सुरक्षा और भुगतान नेटवर्क की जरूरत होती है। UPI पर लेन-देन की संख्या बढ़ने के साथ इन व्यवस्थाओं को बनाए रखने की लागत भी बढ़ती है। एक संसदीय समिति ने UPI के संचालन की लागत करीब ₹20,700 करोड़ बताई थी, जबकि सरकारी सहायता के मुकाबले यह अंतर काफी बड़ा है। इसी वजह से UPI के लिए एक स्थायी और आत्मनिर्भर बिजनेस मॉडल की आवश्यकता पर जोर दिया जा रहा है। दूसरी तरफ, UPI की सबसे बड़ी ताकत इसकी सरलता और कम लागत है। अगर शुल्क बहुत ज्यादा बढ़ता है तो इससे छोटे व्यापारियों और डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देने के प्रयासों पर असर पड़ने की आशंका हो सकती है।

UPI यूजर्स को अभी क्या करना चाहिए?
फिलहाल UPI इस्तेमाल करना बंद करने या घबराने की जरूरत नहीं है। राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद कानूनी ढांचा बदलने का रास्ता साफ हुआ है, लेकिन शुल्क की वास्तविक दर और लागू होने की शर्तें अलग नियमों के जरिए स्पष्ट होंगी। यूजर्स को आगे सरकार, NPCI, RBI और संबंधित बैंकों की आधिकारिक घोषणाओं पर ध्यान देना चाहिए। किसी भी दुकान या व्यक्ति द्वारा मनमाने तरीके से अतिरिक्त UPI शुल्क मांगे जाने की स्थिति में नियमों की जांच करना भी जरूरी होगा।

UPI चार्ज पर जनता की राय क्यों महत्वपूर्ण है?
UPI ने भारत में डिजिटल भुगतान को आसान और तेज बनाया है। छोटे दुकानदार से लेकर बड़े कारोबारी तक इसका इस्तेमाल कर रहे हैं। इसलिए शुल्क व्यवस्था बनाते समय यह संतुलन जरूरी होगा कि डिजिटल पेमेंट सिस्टम आर्थिक रूप से टिकाऊ भी रहे और आम लोगों के लिए सस्ता और सुविधाजनक भी बना रहे। अगर बड़े कारोबारियों से सीमित शुल्क लिया जाता है और छोटे मूल्य के सामान्य UPI भुगतान को सुरक्षित रखा जाता है, तो इससे सिस्टम की आर्थिक स्थिरता और आम लोगों की सुविधा के बीच संतुलन बनाया जा सकता है। वहीं, अगर सीधे आम ग्राहकों पर शुल्क का बोझ डाला जाता है तो इसका विरोध भी देखने को मिल सकता है।

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु की मंजूरी के बाद UPI और अन्य डिजिटल भुगतान माध्यमों पर संभावित MDR शुल्क लगाने का कानूनी रास्ता साफ हो गया है। लेकिन अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि हर UPI भुगतान पर शुल्क लगेगा। असली बदलाव तब स्पष्ट होगा जब सरकार शुल्क की दर, सीमा, भुगतान करने वाले पक्ष और लागू होने वाली शर्तों को लेकर अंतिम नियम जारी करेगी।
UPI भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था की महत्वपूर्ण रीढ़ बन चुका है। इसलिए आने वाली शुल्क व्यवस्था का सबसे बड़ा लक्ष्य यही होना चाहिए कि UPI का विस्तार भी जारी रहे और आम लोगों के लिए डिजिटल भुगतान की सुविधा भी किफायती बनी रहे।

