By: Vikash Kumar Raut (Vicky)
भारतीय वायुसेना के लड़ाकू विमान बेड़े में तेजी से बदलाव हो रहा है। एक तरफ फ्रांस से आए राफेल जैसे अत्याधुनिक लड़ाकू विमान भारतीय वायु शक्ति को नई तकनीकी क्षमता दे रहे हैं, तो दूसरी तरफ स्वदेशी तेजस और भविष्य के तेजस Mk-2 व AMCA से आत्मनिर्भरता की दिशा में बड़ा कदम बढ़ाया जा रहा है। इसके बावजूद करीब तीन दशक से भारतीय वायुसेना की ताकत बने हुए Su-30MKI की भूमिका कम होने के बजाय लगातार महत्वपूर्ण बनी हुई है। आज सवाल यह नहीं है कि राफेल, तेजस या सुखोई में से कौन बेहतर है। असली सवाल यह है कि भारतीय वायुसेना को अलग-अलग क्षमताओं वाले इन विमानों की एक साथ जरूरत क्यों है? इसका जवाब Su-30MKI की भूमिका, आकार, रेंज, हथियार क्षमता और भारतीय परिस्थितियों में इसके लंबे परिचालन अनुभव में छिपा है।

करीब तीन दशक से वायुसेना की रीढ़
भारतीय वायुसेना में सुखोई की कहानी 1997 में शुरू हुई, जब शुरुआती Su-30K विमान सेवा में शामिल किए गए। इसके बाद भारतीय जरूरतों के मुताबिक विकसित Su-30MKI ने वायुसेना के भारी लड़ाकू विमान बेड़े में अपनी मजबूत जगह बनाई। आज भारतीय वायुसेना के पास करीब 260 से अधिक Su-30MKI विमान हैं और यह संख्या इसे देश के सबसे महत्वपूर्ण लड़ाकू विमान प्लेटफॉर्म में शामिल करती है। Su-30MKI की सबसे बड़ी खासियत इसकी भारी श्रेणी का लड़ाकू विमान होना है। इसका बड़ा एयरफ्रेम, दो इंजन, लंबी दूरी और ज्यादा हथियार ले जाने की क्षमता इसे ऐसे मिशनों के लिए उपयोगी बनाती है, जहां हल्के लड़ाकू विमान की क्षमताएं सीमित हो सकती हैं।

राफेल है अत्याधुनिक, फिर भी सुखोई का विकल्प नहीं
राफेल भारतीय वायुसेना के सबसे आधुनिक बहु-भूमिका वाले लड़ाकू विमानों में शामिल है। इसके सेंसर, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम, नेटवर्क-केंद्रित युद्ध क्षमता और आधुनिक हथियार इसे बेहद प्रभावी बनाते हैं। भारत के पास फिलहाल 36 राफेल विमान हैं, जबकि भविष्य में बड़ी संख्या में राफेल हासिल करने की प्रक्रिया भी चर्चा में है। लेकिन राफेल और Su-30MKI को एक-दूसरे का सीधा विकल्प मानना सही नहीं होगा। राफेल आधुनिक तकनीक और बहु-भूमिका वाले अभियानों में महत्वपूर्ण क्षमता देता है, जबकि Su-30MKI भारी लड़ाकू विमान के रूप में लंबी दूरी, बड़े हथियार भार और लंबे समय तक मिशन करने की क्षमता प्रदान करता है।
यानी भारतीय वायुसेना की रणनीति एक विमान को दूसरे से बदलने की नहीं, बल्कि अलग-अलग प्लेटफॉर्म की क्षमताओं को एक साथ इस्तेमाल करने की है।

तेजस से अलग है सुखोई की भूमिका
तेजस भारत का स्वदेशी हल्का लड़ाकू विमान कार्यक्रम है। इसका सबसे बड़ा महत्व सिर्फ इसकी युद्ध क्षमता नहीं बल्कि भारत में लड़ाकू विमानों के निर्माण की आत्मनिर्भर क्षमता को मजबूत करना भी है। तेजस Mk-1 और Mk-1A भारतीय वायुसेना के हल्के लड़ाकू विमान बेड़े को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। वहीं तेजस Mk-2 और AMCA जैसे कार्यक्रम भविष्य में भारतीय वायु शक्ति को नई दिशा देने की तैयारी कर रहे हैं। लेकिन तेजस और Su-30MKI की भूमिका अलग है। तेजस अपेक्षाकृत हल्का विमान है, जबकि Su-30MKI भारी श्रेणी का विमान है। इसलिए दोनों को एक-दूसरे का प्रतिद्वंद्वी मानने के बजाय भारतीय वायुसेना के अलग-अलग हिस्सों की जरूरत पूरी करने वाले प्लेटफॉर्म के तौर पर देखना ज्यादा सही है।

ब्रह्मोस ने बढ़ाई सुखोई की ताकत
Su-30MKI की अहमियत का एक बड़ा कारण इसका भारी हथियार ले जाने की क्षमता है। विमान को भारत की स्वदेशी और भारत में विकसित हथियार प्रणालियों के साथ लगातार एकीकृत किया गया है। खास तौर पर ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल के एयर-लॉन्च संस्करण के साथ Su-30MKI का संयोजन भारतीय वायुसेना की लंबी दूरी की स्ट्राइक क्षमता को मजबूत करता है। बड़े आकार और ज्यादा पेलोड क्षमता के कारण सुखोई ऐसे भारी हथियारों को ले जाने के लिए उपयुक्त प्लेटफॉर्म है। यही कारण है कि आधुनिक राफेल और स्वदेशी तेजस के दौर में भी Su-30MKI को हटाना आसान नहीं है।

‘Super Sukhoi’ से बदलेगा पुराना रूप
सुखोई की उम्र बढ़ रही है, लेकिन भारत की रणनीति इसे तुरंत रिटायर करने की नहीं बल्कि आधुनिक बनाने की है। इसी उद्देश्य से ‘Super Sukhoi’ अपग्रेड कार्यक्रम महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इस कार्यक्रम के तहत Su-30MKI में नए रडार, एवियोनिक्स, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम, सेंसर और आधुनिक हथियार प्रणालियों को शामिल करने की योजना है। इससे पुराने प्लेटफॉर्म की लड़ाकू क्षमता को आने वाले वर्षों की जरूरतों के मुताबिक बढ़ाने की कोशिश की जा रही है। भारतीय रक्षा क्षेत्र में स्वदेशी तकनीक बढ़ाने पर भी जोर है। DRDO और भारतीय उद्योगों की भूमिका के जरिए सुखोई को अधिक स्वदेशी प्रणालियों से लैस करने की दिशा में काम किया जा रहा है। इसका मतलब यह है कि लगभग तीन दशक पुराना एयरफ्रेम आने वाले वर्षों में नई तकनीक के साथ एक अलग रूप में दिखाई दे सकता है।

लड़ाकू स्क्वाड्रन की कमी भी बड़ी वजह
भारतीय वायुसेना लंबे समय से स्वीकृत 42 लड़ाकू स्क्वाड्रनों के मुकाबले कम संख्या में स्क्वाड्रनों के साथ काम कर रही है। 2025 के अंत तक उपलब्ध आकलनों में यह संख्या करीब 29 स्क्वाड्रन बताई गई थी। ऐसे में अचानक बड़ी संख्या में मौजूदा विमानों को हटाना वायुसेना के लिए व्यावहारिक विकल्प नहीं है। तेजस Mk-1A की संख्या बढ़ाने, तेजस Mk-2 विकसित करने और AMCA जैसे कार्यक्रमों को operational स्तर तक पहुंचने में समय लगेगा। ऐसे संक्रमणकाल में Su-30MKI मौजूदा क्षमता और भविष्य की क्षमता के बीच एक महत्वपूर्ण पुल की भूमिका निभाता है।
भारत के लिए तीनों विमान क्यों जरूरी हैं?
अगर सरल भाषा में समझें तो भारतीय वायुसेना के लिए तीनों विमानों की अपनी-अपनी उपयोगिता है।
राफेल आधुनिक सेंसर, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर और बहु-भूमिका वाले मिशनों में मजबूत क्षमता देता है।
तेजस स्वदेशी हल्के लड़ाकू विमान क्षमता, संख्या और घरेलू उत्पादन को बढ़ाने में मदद करता है।
Su-30MKI भारी लड़ाकू विमान के रूप में लंबी दूरी, ज्यादा हथियार क्षमता और बड़े स्ट्राइक मिशनों के लिए महत्वपूर्ण है।
आने वाले समय में AMCA इस संरचना में पांचवीं पीढ़ी की स्टील्थ क्षमता जोड़ने की दिशा में भारत का बड़ा कदम हो सकता है।

निष्कर्ष: सुखोई पुराना जरूर, अप्रासंगिक नहीं
Su-30MKI लगभग तीन दशक पुराना प्लेटफॉर्म है, लेकिन इसकी उपयोगिता सिर्फ इसकी उम्र से तय नहीं होती। इसकी भारी पेलोड क्षमता, लंबी दूरी, दो इंजन, बड़े एयरफ्रेम, भारतीय हथियारों के साथ एकीकरण और बड़ी संख्या में उपलब्धता इसे आज भी भारतीय वायुसेना के लिए बेहद महत्वपूर्ण बनाती है।
राफेल आधुनिक तकनीक की ताकत है, तेजस आत्मनिर्भर भारत की पहचान है और AMCA भविष्य की स्टील्थ शक्ति बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। वहीं Su-30MKI वर्तमान और भविष्य के बीच वह मजबूत कड़ी है, जो भारतीय वायुसेना को संक्रमण के दौर में भारी लड़ाकू क्षमता उपलब्ध कराती है।
इसलिए राफेल और तेजस के दौर में भी सुखोई की जरूरत खत्म नहीं हुई है। बल्कि ‘Super Sukhoi’ जैसे आधुनिकीकरण कार्यक्रम बताते हैं कि भारत पुराने प्लेटफॉर्म को नई तकनीक से लैस कर उसकी उपयोगिता को आने वाले वर्षों तक बनाए रखने की रणनीति पर काम कर रहा है।

