By: Mala Mandal
त्योहारों का मौसम शुरू होने से पहले देश में चीनी की बढ़ती कीमतों ने महंगाई को लेकर नई राजनीतिक बहस छेड़ दी है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने चीनी की कीमतों में पिछले तीन महीनों में करीब 40 प्रतिशत की बढ़ोतरी का दावा करते हुए केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार पर सवाल उठाए हैं। खड़गे ने पूछा कि त्योहारों से ठीक पहले आम जनता पर महंगाई का यह बोझ क्यों पड़ा और इसके लिए जिम्मेदार कौन है। खड़गे ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर सरकार से चीनी के मौजूदा हालात को लेकर कई सवाल पूछे। उन्होंने कहा कि दुनिया के बड़े चीनी उत्पादक और निर्यातक देशों में शामिल भारत में चीनी का स्टॉक कथित तौर पर नौ साल के निचले स्तर पर पहुंच गया है। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि जब देश में चीनी की उपलब्धता को लेकर चिंता बढ़ी तो सरकार को 10 लाख टन चीनी के शुल्क-मुक्त आयात की अनुमति देने की जरूरत क्यों पड़ी।

तीन महीने में 40 फीसदी महंगी चीनी?
मल्लिकार्जुन खड़गे का सबसे बड़ा राजनीतिक हमला चीनी की कीमतों को लेकर है। कांग्रेस अध्यक्ष ने दावा किया है कि पिछले तीन महीनों में चीनी करीब 40 प्रतिशत महंगी हो गई है। उन्होंने सवाल उठाया कि त्योहारों से पहले जब घरों में मिठाइयों और अन्य खाद्य पदार्थों की मांग बढ़ती है, तब चीनी की कीमतों में इतनी तेज वृद्धि का बोझ आखिर आम उपभोक्ता क्यों उठाए?

कुछ हालिया बाजार रिपोर्टों में भी चीनी की कीमतों में तेज बढ़ोतरी की बात सामने आई है। रॉयटर्स के मुताबिक अगस्त की शुरुआत में भारतीय चीनी कीमतें एक महीने में करीब 10 प्रतिशत बढ़कर रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई थीं। इसकी वजह सीमित आपूर्ति और त्योहारों से पहले बढ़ती मांग को बताया गया था।
वहीं, हाल की रिपोर्टों में कुछ बाजारों में खुदरा कीमतों में और तेज बढ़ोतरी का उल्लेख किया गया है। ऐसे में चीनी की कीमतों का मुद्दा अब सिर्फ बाजार का विषय नहीं रह गया है, बल्कि राजनीतिक बहस का भी हिस्सा बन गया है।

खड़गे ने एथेनॉल नीति पर भी उठाया सवाल
कांग्रेस अध्यक्ष ने चीनी संकट को केंद्र की एथेनॉल नीति से भी जोड़ते हुए सवाल किया है। उनका कहना है कि जब देश में चीनी की उपलब्धता कम हो रही है और कीमतें बढ़ रही हैं, तब पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रण यानी E20 नीति की समीक्षा क्यों नहीं की जा रही?
खड़गे का तर्क है कि गन्ने और अन्य कृषि उत्पादों के इस्तेमाल को एथेनॉल उत्पादन की ओर मोड़ने की नीति पर सरकार को दोबारा विचार करना चाहिए। हालांकि, केंद्र सरकार ने चीनी की कीमतों में हालिया वृद्धि को एथेनॉल के लिए चीनी के इस्तेमाल से जोड़ने वाली दलील को खारिज किया है। सरकार ने कम उत्पादन, मौसम से जुड़ी फसल प्रभावित होने की स्थिति, त्योहारों से पहले बढ़ी मांग, सीमित वैश्विक आपूर्ति और बाजार में सट्टेबाजी या जमाखोरी जैसे कारणों की ओर इशारा किया है।

सरकार ने क्या कदम उठाए?
चीनी की कीमतों में तेजी को देखते हुए केंद्र सरकार पहले ही बाजार में उपलब्धता और कीमतों को नियंत्रित करने के लिए कई कदम उठा चुकी है। जुलाई में सरकार ने चीनी डीलरों के लिए स्टॉक रखने की सीमा लागू करने का फैसला किया था। यह व्यवस्था 1 अगस्त से 30 नवंबर 2026 तक लागू रहने वाली है। सरकार ने कहा था कि इस कदम का उद्देश्य जमाखोरी, सट्टेबाजी और कृत्रिम कमी की स्थिति को रोकना तथा उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा करना है।
सरकार के मुताबिक कुछ व्यापारियों और बाजार बिचौलियों द्वारा जमाखोरी और सट्टा कारोबार के कारण चीनी की कीमतों में अनावश्यक अस्थिरता पैदा हुई। सरकार ने यह भी कहा था कि देश में घरेलू खपत की जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त चीनी उपलब्ध है और बाजार पर लगातार नजर रखी जा रही है।
इसके बावजूद कीमतों में तेजी जारी रहने के बाद केंद्र ने 10 लाख मीट्रिक टन कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त आयात की अनुमति दी है। यह कदम घरेलू बाजार में आपूर्ति बढ़ाने और कीमतों पर दबाव कम करने के उद्देश्य से उठाया गया है।

आखिर चीनी क्यों महंगी हो रही है?
चीनी की कीमतों में बढ़ोतरी के पीछे सिर्फ एक कारण नहीं बताया जा रहा है। बाजार विशेषज्ञों और सरकारी पक्ष से सामने आए कारणों में घरेलू उत्पादन में कमी, मौसम की स्थिति, सीमित स्टॉक, त्योहारों से पहले मांग में वृद्धि और बाजार में जमाखोरी या सट्टेबाजी शामिल हैं।
सरकार के अनुमान के मुताबिक मौजूदा चीनी सीजन में उत्पादन शुरुआती अनुमान से कम रह सकता है। रिपोर्टों के अनुसार उत्पादन का अनुमान करीब 306 लाख टन तक रहने की बात कही गई है, जो राज्यों द्वारा दिए गए शुरुआती 343 लाख टन के अनुमान से लगभग 11 प्रतिशत कम है।

यानी एक तरफ उत्पादन और उपलब्ध स्टॉक पर दबाव है, वहीं दूसरी तरफ त्योहारों के दौरान चीनी की खपत बढ़ने की संभावना रहती है। यही कारण है कि बाजार में कीमतों को लेकर चिंता बढ़ी है।
त्योहारों में आम आदमी पर कितना असर?
भारत में त्योहारों के दौरान चीनी की मांग स्वाभाविक रूप से बढ़ जाती है। मिठाइयां, घर में बनने वाले पकवान और खाद्य उद्योग की मांग बढ़ने से चीनी की खपत भी बढ़ती है। ऐसे में अगर कीमतें ऊंची बनी रहती हैं तो इसका सीधा असर घरेलू बजट पर पड़ सकता है।
इसके अलावा चीनी सिर्फ घरों में इस्तेमाल होने वाला उत्पाद नहीं है। मिठाई दुकानों, बेकरी, होटल, रेस्तरां और खाद्य प्रसंस्करण उद्योग की लागत पर भी इसका असर पड़ सकता है। यदि कच्चे माल की कीमत बढ़ती है तो उसका कुछ हिस्सा आगे चलकर तैयार उत्पादों की कीमत में दिखाई दे सकता है।.

कांग्रेस के सवाल बनाम सरकार की दलील
चीनी की कीमतों को लेकर अब मुख्य सवाल राजनीतिक भी है और आर्थिक भी। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे सरकार से जवाब मांग रहे हैं कि जब भारत चीनी उत्पादन में मजबूत स्थिति रखता है तो स्टॉक इतना कम क्यों हुआ और कीमतों में इतनी तेज वृद्धि कैसे हुई।
दूसरी तरफ सरकार का कहना है कि कीमतों में वृद्धि के पीछे कम उत्पादन, मौसम, मांग और बाजार की परिस्थितियां हैं तथा सरकार स्थिति को नियंत्रित करने के लिए लगातार कदम उठा रही है। सरकार ने स्टॉक लिमिट लागू करने के साथ आयात की अनुमति भी दी है।
ऐसे में आने वाले दिनों में सबसे अहम बात यह होगी कि शुल्क-मुक्त आयात से घरेलू बाजार में चीनी की उपलब्धता कितनी बढ़ती है और इसका खुदरा कीमतों पर कितना असर पड़ता है।
त्योहारों से पहले चीनी की कीमतों में तेजी ने आम जनता, व्यापारियों और सरकार—तीनों के लिए चिंता बढ़ा दी है। मल्लिकार्जुन खड़गे ने करीब 40 प्रतिशत कीमत बढ़ने के दावे के साथ मोदी सरकार को घेरा है और चीनी स्टॉक, आयात तथा एथेनॉल नीति पर सवाल उठाए हैं। वहीं सरकार ने कीमतों में तेजी के लिए एथेनॉल नीति को जिम्मेदार मानने से इनकार किया है और कम उत्पादन, सीमित आपूर्ति तथा बाजार की परिस्थितियों को प्रमुख कारण बताया है।
अब नजर इस बात पर रहेगी कि सरकार के आयात और स्टॉक नियंत्रण जैसे कदमों से चीनी की कीमतों में कितनी राहत मिलती है और त्योहारों के दौरान आम उपभोक्ताओं को महंगी चीनी से कितनी राहत मिल पाती है।

