By: Vikash, Mala Mandal
देवघर। बाबा नगरी देवघर में विशुवा संक्रांति का पर्व इस वर्ष भी पूरे धार्मिक उत्साह, श्रद्धा और परंपरागत रीति-रिवाजों के साथ मनाया गया। मंगलवार को तड़के सुबह से ही मंदिरों और घरों में पूजा-अर्चना का दौर शुरू हो गया था। इस खास अवसर पर बाबा बैद्यनाथ मंदिर में प्रातःकालीन पूजा के दौरान भगवान को गुड़, सत्तू और दही का विशेष भोग अर्पित किया गया, जो इस पर्व की प्रमुख परंपरा मानी जाती है।

मंदिर परिसर में सुबह से ही श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ी। भक्तों ने विधिपूर्वक पूजा-अर्चना कर अपने परिवार की सुख-समृद्धि, स्वास्थ्य और खुशहाली की कामना की। धार्मिक माहौल के बीच भक्ति गीतों और मंत्रोच्चार से पूरा क्षेत्र भक्तिमय हो उठा।
विशुवा संक्रांति के अवसर पर केवल मंदिरों में ही नहीं, बल्कि शहर के हर घर में भी पूजा-पाठ का विशेष आयोजन किया गया। लोगों ने अपने-अपने घरों में कुल देवी-देवताओं को गुड़, सत्तू और दही का भोग अर्पित किया। इसके बाद परिवार के सभी सदस्यों ने प्रसाद ग्रहण किया। इस परंपरा के पीछे मान्यता है कि यह शरीर को ठंडक प्रदान करता है और आने वाले भीषण गर्मी के मौसम में स्वास्थ्य को संतुलित रखने में सहायक होता है।

इस दिन की एक विशेष परंपरा ‘घटदान’ भी है, जिसे श्रद्धालुओं ने बड़े श्रद्धा भाव के साथ निभाया। पितृहीन लोगों ने अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति और तृप्ति के लिए मिट्टी के घड़े में जल भरकर दान किया। इसके साथ ही पलाश के पत्ते, पंखा, वस्त्र, गुड़, सत्तू और दही का भी दान किया गया। मान्यता है कि इस प्रकार का दान करने से पूर्वजों को शीतलता प्राप्त होती है और वे प्रसन्न होकर अपने वंशजों को आशीर्वाद देते हैं।
धार्मिक ग्रंथों और पुराणों के अनुसार वैशाख माह में जलदान का अत्यंत महत्व होता है। कहा जाता है कि इस महीने में जल का दान करने से स्वर्ण दान के समान पुण्य फल प्राप्त होता है। विशेष रूप से विशुवा संक्रांति और अक्षय तृतीया के दिन घटदान का महत्व और अधिक बढ़ जाता है। यही कारण है कि इस दिन बड़ी संख्या में लोग इस परंपरा का पालन करते हैं।

विशुवा संक्रांति का महत्व केवल धार्मिक दृष्टिकोण तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका वैज्ञानिक और स्वास्थ्य संबंधी पक्ष भी बेहद महत्वपूर्ण है। दरअसल, इस समय सूर्य मेष राशि में प्रवेश करता है, जिससे तापमान में तेजी से वृद्धि होती है। गर्मी के इस मौसम में शरीर पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है, जैसे डिहाइड्रेशन, थकान और पेट से जुड़ी समस्याएं।
ऐसे में हमारे पूर्वजों द्वारा निर्धारित यह परंपरा काफी उपयोगी साबित होती है। सत्तू, गुड़ और दही जैसे खाद्य पदार्थ शरीर को ठंडक प्रदान करते हैं और पाचन तंत्र को मजबूत बनाते हैं। सत्तू में प्रोटीन और फाइबर भरपूर मात्रा में होता है, जो शरीर को ऊर्जा देता है और लंबे समय तक ठंडक बनाए रखता है। वहीं दही पेट के लिए लाभकारी होता है और गुड़ शरीर में ऊर्जा बनाए रखने में मदद करता है। इस प्रकार यह पर्व धार्मिक आस्था के साथ-साथ स्वास्थ्य के लिहाज से भी बेहद उपयोगी है।

भारत के विभिन्न राज्यों में भी इस पर्व को अलग-अलग नामों से मनाया जाता है। पंजाब, पश्चिम बंगाल, ओडिशा और अन्य क्षेत्रों में यह पर्व रबी फसल की कटाई के साथ जुड़ा हुआ है। इन राज्यों में यह कृषि से संबंधित उत्सव के रूप में भी मनाया जाता है, जहां किसान अपनी मेहनत के फल का जश्न मनाते हैं।
देवघर में भी इस पर्व का विशेष महत्व है, क्योंकि यह धार्मिक नगरी होने के साथ-साथ सांस्कृतिक परंपराओं का केंद्र भी है। यहां के लोग वर्षों से इस परंपरा को निभाते आ रहे हैं और आने वाली पीढ़ियों को भी इसकी जानकारी दे रहे हैं।

कुल मिलाकर, विशुवा संक्रांति का यह पर्व आस्था, परंपरा, संस्कृति और स्वास्थ्य का अद्भुत संगम है। यह न केवल धार्मिक मान्यताओं को मजबूत करता है, बल्कि लोगों को प्रकृति और स्वास्थ्य के प्रति जागरूक भी बनाता है। यही कारण है कि आज के आधुनिक समय में भी यह पर्व अपनी प्रासंगिकता बनाए हुए है और पूरे उत्साह के साथ मनाया जा रहा है।

