By: Vikash Kumar Raut (Vicky)
क्या आपका बच्चा भी स्कूल से लौटते समय अपने बैग में किसी दूसरे बच्चे की पेंसिल, इरेजर, रबर, शार्पनर या छोटा खिलौना लेकर आता है? अगर हां, तो सबसे पहले घबराने या बच्चे को चोर कहकर डांटने की जरूरत नहीं है। छोटे बच्चों में बिना अनुमति किसी की चीज उठा लेना हमेशा चोरी करने की आदत या किसी मानसिक बीमारी का संकेत नहीं होता। कई बार बच्चे उम्र के उस पड़ाव पर होते हैं, जहां उन्हें अपनी और दूसरे की चीज के बीच का फर्क तो पता होता है, लेकिन किसी वस्तु को बिना पूछे लेना गलत क्यों है, इसकी समझ पूरी तरह विकसित नहीं हुई होती। वहीं कुछ मामलों में बच्चा किसी चीज को पसंद करने, दोस्तों की नकल करने, ध्यान आकर्षित करने या अपनी इच्छा तुरंत पूरी करने के कारण भी ऐसा कर सकता है।

माता-पिता के लिए सबसे जरूरी बात यह समझना है कि बच्चे के इस व्यवहार के पीछे कारण क्या है। केवल डांटने या सजा देने के बजाय प्यार और समझदारी से बच्चे से बात करना ज्यादा प्रभावी हो सकता है।
बच्चे दूसरे की चीजें क्यों उठा लाते हैं?
बच्चों के इस व्यवहार के पीछे कई अलग-अलग कारण हो सकते हैं। छोटे बच्चों में जिज्ञासा इसका एक सामान्य कारण है। उन्हें किसी दूसरे बच्चे की चमकदार पेंसिल, नया इरेजर या आकर्षक खिलौना पसंद आ जाता है और वे बिना ज्यादा सोचे उसे अपने बैग में रख लेते हैं। कुछ बच्चे अपने दोस्तों को देखकर भी ऐसा व्यवहार दोहरा सकते हैं। अगर उन्होंने किसी साथी को दूसरे की चीज लेते देखा है, तो वे उसे गलत व्यवहार की बजाय सामान्य काम समझ सकते हैं। कई बार बच्चा यह भी सोच सकता है कि अगर कोई चीज जमीन पर पड़ी है या किसी ने उसे इस्तेमाल नहीं किया है, तो वह उसे ले सकता है। ऐसे मामलों में बच्चे को धीरे-धीरे यह समझाना जरूरी है कि किसी वस्तु का मालिक न दिखने का मतलब यह नहीं है कि वह किसी की नहीं है।

क्या यह मानसिक बीमारी का संकेत है?
सिर्फ स्कूल से पेंसिल, इरेजर या छोटी-मोटी चीज उठा लाने के आधार पर बच्चे को किसी मानसिक बीमारी से ग्रसित मान लेना सही नहीं है। बच्चों में कभी-कभार ऐसा व्यवहार विकास के सामान्य चरण का हिस्सा हो सकता है। हालांकि, अगर बच्चा बार-बार जानबूझकर दूसरों की चीजें लेता है, समझाने और रोकने के बावजूद व्यवहार जारी रहता है और उसे अपने किए पर कोई पछतावा या चिंता नहीं होती, तो माता-पिता को स्थिति को गंभीरता से समझने की जरूरत हो सकती है। ऐसे मामलों में बच्चे के व्यवहार के दूसरे पहलुओं पर भी ध्यान देना जरूरी है। क्या बच्चा घर, स्कूल और दोस्तों के बीच भी लगातार नियम तोड़ता है? क्या वह जानबूझकर दूसरों को नुकसान पहुंचाता है? क्या उसे झूठ बोलने, चीजें छिपाने या दूसरों की भावनाओं की परवाह न करने जैसी लगातार समस्या है? केवल इन संकेतों के आधार पर भी कोई बीमारी तय नहीं की जा सकती, लेकिन ऐसी स्थिति में बाल रोग विशेषज्ञ या बाल मनोवैज्ञानिक से सलाह लेना उपयोगी हो सकता है।

बच्चे को ‘चोर’ कहकर न पुकारें
अगर बच्चे के बैग में किसी दूसरे बच्चे की चीज मिलती है तो गुस्से में उसे चोर, बदमाश या खराब बच्चा कहना समस्या को और बढ़ा सकता है। इससे बच्चे के मन में शर्म और डर पैदा हो सकता है। व्यवहार को गलत बताएं, बच्चे को नहीं। उदाहरण के लिए आप कह सकते हैं, “यह पेंसिल तुम्हारी नहीं है। किसी की चीज बिना पूछे लेना सही नहीं है। हमें इसे उसके मालिक को वापस करना चाहिए।”
इस तरह बच्चा यह समझ पाएगा कि गलती उसके व्यवहार में है, उसकी पूरी पहचान में नहीं।

बच्चे से प्यार से पूछें कि उसने ऐसा क्यों किया
बच्चे को डांटने से पहले शांत होकर पूछें कि उसने वह चीज क्यों ली। बातचीत करते समय आवाज सामान्य रखें। आप उससे पूछ सकते हैं कि क्या उसे पेंसिल पसंद आई थी, क्या किसी दोस्त ने उसे दी थी या उसने गलती से अपने बैग में रख ली। कई बार बच्चा यह भी बता सकता है कि किसी दूसरे बच्चे ने उसे सामान रखने के लिए दिया था।
बच्चे का जवाब सुनने के बाद ही आगे की कार्रवाई करें। इससे आपको वास्तविक कारण समझने में मदद मिलेगी।

बच्चे को ‘मेरा और तुम्हारा’ का फर्क समझाएं
छोटी उम्र से ही बच्चों को अपनी और दूसरों की चीजों के बारे में समझाना जरूरी है। उसे बताएं कि उसकी पेंसिल, किताब और खिलौने उसके हैं, जबकि दूसरे बच्चे की चीजें उसकी अपनी हैं।
अगर बच्चा किसी चीज को पसंद करता है तो उसे यह सिखाएं कि वह उसे मांग सकता है। उदाहरण के लिए, “क्या मैं तुम्हारी पेंसिल से थोड़ी देर लिख सकता हूं?” जैसी भाषा सिखाना बच्चे के व्यवहार में सकारात्मक बदलाव ला सकता है।

चीज वापस करना भी सिखाएं
अगर बच्चा किसी दूसरे बच्चे की चीज लेकर घर आया है, तो उसे वापस करना केवल जरूरी ही नहीं, बल्कि सीखने का अच्छा अवसर भी है।
बच्चे को साथ लेकर वह सामान स्कूल वापस भेजें। उससे बच्चे को यह समझाने की कोशिश करें कि गलती होने के बाद उसे सुधारना भी हमारी जिम्मेदारी है।
जरूरत पड़ने पर बच्चा खुद अपने दोस्त या शिक्षक से माफी मांग सकता है। लेकिन उसे सबके सामने शर्मिंदा करने से बचें।
बच्चे को हर छोटी गलती पर सजा न दें
कुछ माता-पिता डर के कारण बच्चे को मारने या कड़ी सजा देने लगते हैं। ऐसा करने से बच्चा अपनी गलती स्वीकार करने के बजाय उसे छिपाना सीख सकता है। इसके बजाय स्पष्ट नियम बनाएं। उसे बताएं कि किसी की चीज बिना अनुमति लेना स्वीकार्य नहीं है। अगर बच्चा गलती दोहराता है तो उम्र के अनुसार उचित और शांत तरीके से परिणाम समझाएं।

क्या बच्चे को पैसे या सामान देकर खुश करना चाहिए?
अगर बच्चा बार-बार दूसरों की चीजें इसलिए लेता है क्योंकि उसे घर पर वैसी चीजें नहीं मिलतीं, तो माता-पिता को उसकी जरूरत और इच्छा के बीच अंतर समझना चाहिए। हर बार बच्चा किसी चीज की मांग करे और उसे तुरंत खरीद देना भी सही तरीका नहीं है। उसे यह समझाएं कि हर पसंद की चीज तुरंत मिलना जरूरी नहीं है और दूसरों की चीज लेना उसका समाधान नहीं है।
स्कूल से भी बात करें
अगर यह व्यवहार बार-बार हो रहा है, तो बच्चे के शिक्षक से बातचीत करना उपयोगी हो सकता है। शिक्षक बता सकते हैं कि बच्चा स्कूल में कैसा व्यवहार करता है और क्या वह दूसरे बच्चों की चीजें अक्सर उठाता है। कभी-कभी स्कूल में बच्चे के दोस्तों, पढ़ाई, सामाजिक व्यवहार या किसी विशेष परिस्थिति से जुड़ी जानकारी माता-पिता को घर पर दिखाई देने वाले व्यवहार को समझने में मदद करती है।

किन परिस्थितियों में विशेषज्ञ से सलाह लें?
अगर बच्चा कभी-कभार किसी की पेंसिल उठा लाता है और समझाने के बाद उसे वापस कर देता है, तो आमतौर पर केवल इस एक व्यवहार के आधार पर किसी मानसिक बीमारी का निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए। लेकिन अगर लंबे समय तक बार-बार चोरी जैसा व्यवहार जारी रहे, बच्चा जानबूझकर दूसरों को नुकसान पहुंचाने लगे, घर और स्कूल दोनों जगह गंभीर व्यवहार संबंधी समस्याएं दिखाई दें या माता-पिता को बच्चे के व्यवहार को संभालने में लगातार कठिनाई हो रही हो, तो बाल रोग विशेषज्ञ या योग्य बाल मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लेना बेहतर है।
विशेषज्ञ बच्चे की उम्र, व्यवहार, पारिवारिक माहौल, स्कूल की परिस्थितियों और अन्य लक्षणों को देखकर उचित मार्गदर्शन दे सकते हैं।
माता-पिता के लिए सबसे जरूरी बात
बच्चे के बैग में किसी दूसरे बच्चे की पेंसिल या इरेजर देखकर तुरंत डरने की जरूरत नहीं है। पहले बच्चे की उम्र और परिस्थिति को समझें। शांत होकर बातचीत करें, सही और गलत का अंतर बताएं, सामान वापस करवाएं और भविष्य में बिना अनुमति किसी की चीज न लेने की आदत विकसित करें। बच्चे के व्यवहार में सुधार के लिए लगातार प्यार, स्पष्ट नियम और सही मार्गदर्शन सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण हैं। एक-दो घटनाओं के आधार पर बच्चे पर कोई मानसिक बीमारी का लेबल लगाना उचित नहीं है।
यह लेख सामान्य parenting और child-behaviour awareness के उद्देश्य से लिखा गया है। केवल किसी दूसरे की पेंसिल, इरेजर या वस्तु उठा लेने के आधार पर बच्चे में किसी मानसिक बीमारी का निदान नहीं किया जा सकता। हर बच्चे का व्यवहार उसकी उम्र, परिस्थितियों और विकास के अनुसार अलग हो सकता है। यदि बच्चे का व्यवहार लगातार, गंभीर या चिंता का कारण बन रहा है, तो योग्य बाल रोग विशेषज्ञ या बाल मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से व्यक्तिगत सलाह लें।

