By: Vikash kumar Raut (Vicky)
देवघर: झारखंड के प्रसिद्ध धार्मिक स्थल बाबा बैद्यनाथ धाम मंदिर में ऊर्जा व्यवस्था को लेकर एक बड़ी लापरवाही सामने आई है। मंदिर में निर्बाध बिजली आपूर्ति सुनिश्चित करने और डीजल पर निर्भरता खत्म करने के उद्देश्य से करीब 3 करोड़ रुपये की लागत से लगाया गया सोलर प्लांट आज पूरी तरह से ठप पड़ा हुआ है। विभागीय उदासीनता और रखरखाव के अभाव के कारण यह महत्वाकांक्षी परियोजना बेकार साबित हो रही है, जबकि मंदिर में आज भी हर दिन सैकड़ों लीटर डीजल की खपत जारी है।

जानकारी के अनुसार, देवघर के जलसार तालाब क्षेत्र में स्थापित इस सोलर प्लांट की क्षमता लगभग 100 किलोवाट है। इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य मंदिर परिसर में निर्बाध बिजली आपूर्ति सुनिश्चित करना और जनरेटर के उपयोग को कम करना था, ताकि डीजल की खपत में कमी लाई जा सके और पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा मिल सके। लेकिन वर्तमान स्थिति इस योजना के उद्देश्य के बिल्कुल विपरीत दिखाई दे रही है।

स्थानीय लोगों और जनप्रतिनिधियों का कहना है कि यह सोलर प्लांट अब पूरी तरह से उपेक्षा का शिकार हो चुका है। प्लांट परिसर में चारों ओर झाड़ियां और जंगल उग आए हैं, जिससे साफ तौर पर यह स्पष्ट होता है कि लंबे समय से इसकी देखरेख नहीं की गई है। मशीनें जर्जर हालत में पहुंच चुकी हैं और तकनीकी रूप से भी यह पूरी तरह निष्क्रिय हो चुका है।
इस मामले पर वार्ड पार्षद शैलजा देवी ने भी गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि यह प्रोजेक्ट सांसद निशिकांत दुबे का ड्रीम प्रोजेक्ट था, जिसके तहत तीन तालाबों को भरकर इस सोलर प्लांट का निर्माण कराया गया था। इस परियोजना से उम्मीद थी कि मंदिर की पूरी बिजली जरूरत इसी प्लांट से पूरी हो जाएगी और डीजल की खपत पर रोक लगेगी। लेकिन मंदिर प्रशासन और संबंधित विभागों की लापरवाही के कारण यह योजना धरातल पर असफल साबित हुई है।

उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि मंदिर प्रशासन हर योजना का लाभ तो लेना चाहता है, लेकिन उसके रखरखाव की जिम्मेदारी निभाने में पूरी तरह विफल है। यही कारण है कि करोड़ों रुपये की लागत से बना यह प्लांट आज खंडहर में तब्दील हो चुका है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस सोलर प्लांट को सही तरीके से संचालित किया जाता, तो इससे न केवल आर्थिक बचत होती बल्कि पर्यावरण पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ता। डीजल के अत्यधिक उपयोग से जहां एक ओर वायु प्रदूषण बढ़ता है, वहीं दूसरी ओर मंदिर प्रशासन पर आर्थिक बोझ भी बढ़ता है। सोलर ऊर्जा एक स्वच्छ और सस्ती ऊर्जा का विकल्प है, जिसका उपयोग इस तरह के धार्मिक स्थलों में बड़े पैमाने पर किया जा सकता है।

वर्तमान में मंदिर में बिजली आपूर्ति के लिए डीजल जनरेटर पर निर्भरता बनी हुई है। अनुमान के अनुसार, हर दिन सैकड़ों लीटर डीजल खर्च किया जा रहा है, जिससे लाखों रुपये का अतिरिक्त व्यय हो रहा है। यह स्थिति तब और चिंताजनक हो जाती है, जब एक कार्यशील सोलर प्लांट पहले से मौजूद होने के बावजूद उसका उपयोग नहीं किया जा रहा है।

स्थानीय नागरिकों ने भी इस मुद्दे पर नाराजगी जताई है और प्रशासन से जल्द से जल्द इस सोलर प्लांट को पुनः चालू करने की मांग की है। उनका कहना है कि यदि समय रहते इस परियोजना की मरम्मत और रखरखाव नहीं किया गया, तो यह पूरी तरह से नष्ट हो जाएगा और सरकारी धन की बर्बादी का एक और उदाहरण बन जाएगा।

इस पूरे मामले ने सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन और निगरानी प्रणाली पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। करोड़ों रुपये खर्च करने के बाद यदि योजनाओं का सही उपयोग नहीं हो पा रहा है, तो यह न केवल संसाधनों की बर्बादी है, बल्कि जनता के विश्वास को भी ठेस पहुंचाता है।
अब देखना यह है कि संबंधित विभाग और मंदिर प्रशासन इस मुद्दे को कितनी गंभीरता से लेते हैं और कब तक इस बंद पड़े सोलर प्लांट को पुनर्जीवित करने के लिए ठोस कदम उठाते हैं। फिलहाल, यह परियोजना लापरवाही और अनदेखी का एक प्रतीक बनकर रह गई है।
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