By: Mala Mandal
Gajanan Sankashti Chaturthi 2026: सावन माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि पर मनाई जाने वाली गजानन संकष्टी चतुर्थी का हिंदू धर्म में विशेष महत्व माना जाता है। इस वर्ष यह पावन व्रत रविवार, 2 अगस्त 2026 को रखा जा रहा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन भगवान श्री गणेश के गजानन स्वरूप की विधि-विधान से पूजा करने और व्रत रखने से जीवन के सभी संकट दूर होते हैं। साथ ही सुख, समृद्धि, बुद्धि, सफलता और सौभाग्य का आशीर्वाद प्राप्त होता है। संकष्टी चतुर्थी का व्रत विशेष रूप से उन लोगों के लिए अत्यंत फलदायी माना जाता है जो अपने जीवन में आर्थिक, पारिवारिक, वैवाहिक या करियर संबंधी परेशानियों का सामना कर रहे हैं।

हिंदू पंचांग के अनुसार प्रत्येक माह की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को संकष्टी चतुर्थी और शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को विनायक चतुर्थी के रूप में मनाया जाता है। सावन माह में पड़ने वाली संकष्टी चतुर्थी को गजानन संकष्टी कहा जाता है, जिसमें भगवान गणेश के गजानन स्वरूप की विशेष पूजा की जाती है। ‘गज’ का अर्थ हाथी और ‘आनन’ का अर्थ मुख होता है, इसलिए भगवान गणेश को गजानन कहा जाता है। यह स्वरूप बुद्धि, विवेक, धैर्य और विघ्नों के नाश का प्रतीक माना जाता है।

गजानन संकष्टी चतुर्थी 2026 शुभ मुहूर्त
तिथि प्रारंभ: 1 अगस्त 2026 की रात्रि लगभग 11:47 बजे
तिथि समाप्त: 2 अगस्त 2026 की रात्रि लगभग 11:15 बजे
पूजा का शुभ समय: प्रातःकाल स्नान के बाद से लेकर दिनभर शुभ चौघड़िया और अभिजीत मुहूर्त में पूजा की जा सकती है।
अभिजीत मुहूर्त: दोपहर लगभग 12:00 बजे से 12:54 बजे तक।
चंद्रोदय का समय: रात्रि लगभग 8:45 बजे (स्थान के अनुसार कुछ मिनटों का अंतर संभव है)। संकष्टी चतुर्थी का व्रत चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद ही खोला जाता है।

गजानन संकष्टी चतुर्थी का धार्मिक महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान गणेश प्रथम पूज्य देव हैं। किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत उनसे ही की जाती है। संकष्टी चतुर्थी पर भगवान गणेश की पूजा करने से सभी प्रकार के विघ्न दूर होते हैं और मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। जिन लोगों के कार्य बार-बार बाधित हो रहे हों, विवाह में देरी हो रही हो, संतान सुख की इच्छा हो या आर्थिक परेशानियां बनी हुई हों, उनके लिए यह व्रत विशेष लाभकारी माना जाता है।

गजानन संकष्टी चतुर्थी पूजा विधि
प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
पूजा स्थल को साफ करके भगवान गणेश की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।
भगवान गणेश को दूर्वा, लाल पुष्प, सिंदूर, मोदक, लड्डू और फल अर्पित करें।
घी का दीपक और धूप जलाकर विधिपूर्वक पूजा करें।
‘ॐ गं गणपतये नमः’ मंत्र का कम से कम 108 बार जाप करें।
गणेश अथर्वशीर्ष या संकटनाशन गणेश स्तोत्र का पाठ करना अत्यंत शुभ माना जाता है।
रात्रि में चंद्रमा के दर्शन कर अर्घ्य दें और भगवान गणेश की आरती के बाद व्रत का पारण करें।

गजानन संकष्टी चतुर्थी पर क्या करें?
भगवान गणेश को 21 दूर्वा अर्पित करें।
मोदक या बेसन के लड्डू का भोग लगाएं।
जरूरतमंद लोगों को अन्न, वस्त्र या मिठाई का दान करें।
पूरे दिन सात्विक भोजन करें और नकारात्मक विचारों से दूर रहें।
क्रोध, झूठ और अपशब्दों से बचने का प्रयास करें।

गजानन संकष्टी चतुर्थी पर क्या न करें?
तामसिक भोजन और नशे का सेवन न करें।
किसी का अपमान या अनादर न करें।
पूजा के दौरान मन में नकारात्मक विचार न लाएं।
चंद्र दर्शन से पहले व्रत का पारण न करें।

गजानन संकष्टी चतुर्थी का फल
मान्यता है कि इस व्रत को श्रद्धा और नियमपूर्वक करने से भगवान गणेश की विशेष कृपा प्राप्त होती है। परिवार में सुख-शांति बनी रहती है, आर्थिक स्थिति मजबूत होती है, करियर और व्यापार में आ रही बाधाएं दूर होती हैं तथा बुद्धि, विवेक और सफलता का आशीर्वाद मिलता है। यह व्रत जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और शुभ फल प्रदान करने वाला माना जाता है।

यह लेख धार्मिक मान्यताओं, पंचांग और पारंपरिक मान्यताओं पर आधारित है। अलग-अलग स्थानों के अनुसार तिथि, पूजा मुहूर्त और चंद्रोदय के समय में कुछ अंतर हो सकता है। किसी भी धार्मिक अनुष्ठान या व्रत को करने से पहले अपने स्थानीय पंचांग या योग्य आचार्य से जानकारी अवश्य प्राप्त करें।

