By: Vikash Kumar (Vicky)
रांची/दुमका: झारखंड में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR (Special Intensive Revision) को लेकर सियासी विवाद लगातार बढ़ता जा रहा है। गोड्डा से भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने SIR प्रक्रिया को लेकर हेमंत सोरेन सरकार पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने दावा किया है कि राज्य सरकार से जुड़े कुछ अधिकारी इस प्रक्रिया को प्रभावित करने की कोशिश कर सकते हैं। दुबे ने इस मामले में निर्वाचन आयोग (ECI) और केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) से जांच कराने की मांग की है।

निशिकांत दुबे ने 20 सितंबर 2026 को दुमका में मीडिया से बातचीत के दौरान SIR से जुड़े मुद्दे को उठाया। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, उन्होंने झारखंड के मुख्य सचिव अविनाश कुमार, स्कूली शिक्षा सचिव उमाशंकर सिंह और रांची के उपायुक्त मंजूनाथ भजंत्री की भूमिका की जांच की मांग की है। दुबे का आरोप है कि राज्य के अधिकारी SIR की प्रक्रिया को प्रभावित करने का प्रयास कर सकते हैं। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और संबंधित अधिकारियों या राज्य सरकार का पक्ष इस रिपोर्ट में उपलब्ध नहीं है।

SIR को लेकर क्या है पूरा विवाद?
निर्वाचन आयोग की ओर से मतदाता सूची को अपडेट करने और पात्र मतदाताओं के नाम सुनिश्चित करने के लिए पुनरीक्षण की प्रक्रिया चलाई जा रही है। झारखंड में SIR को लेकर राजनीतिक दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप तेज हैं। इसी बीच निर्वाचन प्रक्रिया से संबंधित शिकायतें और दस्तावेजों की जांच भी सामने आई है। 5 सितंबर 2026 को झारखंड के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के. रवि कुमार ने पांच लोगों के खिलाफ FIR दर्ज करने का निर्देश दिया था। इन लोगों पर कथित तौर पर फर्जी दस्तावेजों के आधार पर मतदाता सूची में नाम शामिल कराने का प्रयास करने का आरोप था। यह कार्रवाई SIR के दौरान संथाल परगना क्षेत्र में मिली शिकायतों के बाद हुई थी।

दूसरी ओर, निर्वाचन सूची में नामों की जांच को लेकर राजनीतिक दलों की ओर से अलग-अलग सवाल उठाए जा रहे हैं। ऐसे में निशिकांत दुबे के ताजा आरोपों ने झारखंड की राजनीति में SIR को एक और बड़ा मुद्दा बना दिया है।
अधिकारियों की भूमिका पर उठाए सवाल
भाजपा सांसद निशिकांत दुबे का कहना है कि SIR जैसी संवेदनशील चुनावी प्रक्रिया में किसी भी तरह का राजनीतिक या प्रशासनिक हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि राज्य के मुख्य सचिव ने मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी के. रवि कुमार के साथ बैठक की और इस दौरान अन्य अधिकारियों की मौजूदगी भी रही। दुबे ने इसी संदर्भ में अधिकारियों की भूमिका की जांच की मांग की है। उनकी मांग है कि पूरे मामले की स्वतंत्र जांच हो, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि SIR की प्रक्रिया में किसी अधिकारी ने निर्धारित नियमों से हटकर कोई कदम उठाया या नहीं। यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि किसी अधिकारी के खिलाफ आरोप लगाया जाना अपने आप में दोष सिद्ध होने के बराबर नहीं है। आरोपों की वास्तविकता जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकती है।

ECI और CBI से जांच की मांग
निशिकांत दुबे ने निर्वाचन आयोग और CBI से मामले की जांच कराने की मांग की है। उनका तर्क है कि SIR सीधे मतदाता सूची और चुनाव प्रक्रिया से जुड़ा विषय है, इसलिए इसकी निष्पक्षता और पारदर्शिता को लेकर किसी भी शिकायत की गंभीरता से जांच होनी चाहिए। उन्होंने यह भी मांग रखी है कि SIR की प्रक्रिया पूरी होने तक उन अधिकारियों की भूमिका की जांच की जाए, जिन पर उन्होंने सवाल उठाए हैं। दुबे के अनुसार, जांच से यह स्पष्ट हो सकता है कि अधिकारियों की भूमिका केवल प्रशासनिक स्तर तक सीमित थी या उन्होंने चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करने की कोशिश की।

झारखंड में SIR बना राजनीतिक मुद्दा
SIR अब केवल प्रशासनिक प्रक्रिया तक सीमित नहीं रह गया है। झारखंड में सत्तारूढ़ गठबंधन और विपक्ष के बीच इसे लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। भाजपा पहले भी राज्य सरकार और विभिन्न प्रशासनिक मुद्दों को लेकर सवाल उठाती रही है। निशिकांत दुबे की ओर से SIR के संबंध में दिए गए बयान को भी इसी राजनीतिक बहस के हिस्से के रूप में देखा जा रहा है। वहीं, इस पूरे मामले में अंतिम स्थिति निर्वाचन आयोग और संबंधित जांच एजेंसियों की कार्रवाई से ही स्पष्ट होगी। हाल ही में झारखंड में मतदाता सूची से जुड़े दावों और आपत्तियों की प्रक्रिया के लिए निर्वाचन आयोग ने समयसीमा में बदलाव भी किया है। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार, SIR से संबंधित दावे और आपत्तियां दाखिल करने की अंतिम तारीख 30 सितंबर 2026 तक बढ़ाई गई है। इससे पात्र मतदाताओं को अपनी प्रविष्टियों में सुधार या आपत्ति दर्ज कराने के लिए अतिरिक्त समय मिला है।

आगे क्या हो सकता है?
निशिकांत दुबे की मांग के बाद अब निगाहें निर्वाचन आयोग और संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों की प्रतिक्रिया पर हैं। यदि शिकायतों पर औपचारिक जांच शुरू होती है तो अधिकारियों की बैठकों, निर्देशों और SIR प्रक्रिया से जुड़े दस्तावेजों की जांच की जा सकती है। वहीं, यदि किसी स्तर पर नियमों के उल्लंघन की पुष्टि होती है तो संबंधित जिम्मेदार लोगों पर नियमानुसार कार्रवाई का रास्ता खुल सकता है। इसके विपरीत, यदि जांच में आरोपों की पुष्टि नहीं होती है तो राजनीतिक आरोपों को लेकर भी स्थिति स्पष्ट हो सकती है।

फिलहाल इतना साफ है कि झारखंड में SIR को लेकर राजनीतिक और प्रशासनिक बहस तेज हो गई है। भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने जहां ECI और CBI जांच की मांग की है, वहीं इस मामले में किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले संबंधित संस्थाओं की आधिकारिक जांच और सभी पक्षों के जवाब का इंतजार करना जरूरी होगा।
SIR जैसी प्रक्रिया का सीधा संबंध मतदाता सूची से है। ऐसे में मतदाताओं के लिए भी जरूरी है कि वे अपने नाम और विवरण की जांच करें तथा निर्धारित समयसीमा के भीतर किसी गलती या आपत्ति की स्थिति में संबंधित निर्वाचन कार्यालय के समक्ष दावा या आपत्ति दर्ज कराएं।

