By: Mala Mandal
Mangla Gauri Vrat 2026: सावन का महीना भगवान शिव और माता पार्वती की आराधना के लिए विशेष माना जाता है। सावन के प्रत्येक मंगलवार को सुहागिन महिलाएं पति की लंबी आयु, सुखी वैवाहिक जीवन और परिवार की समृद्धि की कामना से मंगला गौरी व्रत रखती हैं। इस बार सावन के तीसरे मंगलवार को मंगला गौरी व्रत रखा जा रहा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन माता गौरी की विधि-विधान से पूजा करने और व्रत रखने से वैवाहिक जीवन में सुख-शांति बनी रहती है। मंगला गौरी व्रत को विशेष रूप से महिलाओं के लिए महत्वपूर्ण माना गया है। हालांकि श्रद्धालु अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार माता गौरी की पूजा कर सकते हैं। इस दिन सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनने के बाद व्रत का संकल्प लिया जाता है और माता पार्वती की पूजा की जाती है।

क्यों खास है मंगला गौरी व्रत?
धार्मिक मान्यता के अनुसार मंगलवार का दिन माता पार्वती के मंगल स्वरूप से जुड़ा हुआ है। सावन के मंगलवार को रखा जाने वाला मंगला गौरी व्रत माता गौरी को समर्पित माना जाता है। मान्यता है कि इस व्रत को श्रद्धा से करने से महिलाओं को अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद प्राप्त होता है और दांपत्य जीवन में प्रेम और सामंजस्य बना रहता है। कुंवारी कन्याएं भी अच्छे जीवनसाथी की कामना से मंगला गौरी की पूजा कर सकती हैं। वहीं विवाहित महिलाएं पति की लंबी आयु, परिवार की सुख-समृद्धि और वैवाहिक जीवन में खुशहाली की कामना से यह व्रत रखती हैं।

तीसरे मंगला गौरी व्रत पर सुबह क्या करें?
व्रत रखने वाली महिलाओं को सुबह सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करने के बाद पूजा स्थल की सफाई करनी चाहिए। इसके बाद स्वच्छ वस्त्र पहनकर माता गौरी और भगवान शिव का ध्यान करना चाहिए। पूजा स्थान पर माता गौरी की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करके दीपक जलाएं। इसके बाद माता को फूल, अक्षत, रोली, सिंदूर, फल और अन्य पूजा सामग्री अर्पित करें। भगवान शिव की पूजा भी श्रद्धा से करें। इसके बाद मंगला गौरी व्रत की कथा का पाठ या श्रवण किया जा सकता है। अपनी श्रद्धा के अनुसार माता के मंत्रों का जाप करें और परिवार की सुख-शांति के लिए प्रार्थना करें।

मंगला गौरी व्रत में क्या करना चाहिए?
मंगला गौरी व्रत के दिन कुछ धार्मिक कार्यों को विशेष रूप से शुभ माना जाता है।
सबसे पहले माता गौरी और भगवान शिव की श्रद्धा से पूजा करें। पूजा के दौरान माता को सुहाग की सामग्री अर्पित करना भी परंपरा का हिस्सा माना जाता है। इसमें सिंदूर, बिंदी, चूड़ी, मेहंदी, कुमकुम और अन्य सुहाग सामग्री शामिल की जा सकती है। इस दिन जरूरतमंद व्यक्ति को अपनी सामर्थ्य के अनुसार भोजन, वस्त्र या अन्य आवश्यक वस्तुओं का दान करना भी शुभ माना जाता है। घर में शांतिपूर्ण वातावरण बनाए रखें और परिवार के सदस्यों के साथ प्रेम से व्यवहार करें।

मंगला गौरी व्रत में क्या नहीं करना चाहिए?
व्रत के दिन मन, वचन और कर्म से संयम रखने की परंपरा है। किसी से झगड़ा या अपशब्द बोलने से बचना चाहिए। नकारात्मक विचारों और क्रोध को दूर रखने का प्रयास करें। व्रत रखने वाली महिलाओं को अपनी स्वास्थ्य स्थिति का भी ध्यान रखना चाहिए। यदि किसी व्यक्ति को उपवास करने से कमजोरी या स्वास्थ्य संबंधी परेशानी होती है, तो बिना चिकित्सकीय सलाह के कठिन उपवास नहीं करना चाहिए। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन तामसिक भोजन और नशे जैसी चीजों से दूर रहने की सलाह दी जाती है। पूजा के दौरान मन को शांत रखते हुए भगवान और माता गौरी का ध्यान करना अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है।

मंगला गौरी पूजा में कौन-कौन सी सामग्री रखें?
माता गौरी की पूजा के लिए सामान्य रूप से रोली, अक्षत, सिंदूर, फूल, फल, दीपक, धूप, नैवेद्य और पूजा के लिए आवश्यक अन्य सामग्री रखी जाती है। विवाहित महिलाएं अपनी श्रद्धा के अनुसार माता को सुहाग की सामग्री भी अर्पित कर सकती हैं। पूजा सामग्री में किसी विशेष वस्तु का होना अनिवार्य नहीं माना जाना चाहिए। श्रद्धा और साफ मन से पूजा करना अधिक महत्वपूर्ण है।
मंगला गौरी व्रत की पूजा विधि
सुबह स्नान करने के बाद पूजा स्थल को साफ करें और माता गौरी की तस्वीर या प्रतिमा स्थापित करें। सबसे पहले भगवान गणेश का ध्यान करें। इसके बाद माता गौरी और भगवान शिव का आवाहन करके दीपक और धूप जलाएं। माता को रोली, अक्षत, फूल, सिंदूर और सुहाग सामग्री अर्पित करें। भगवान शिव को जल और अपनी श्रद्धा के अनुसार पूजा सामग्री अर्पित करें। इसके बाद मंगला गौरी व्रत की कथा पढ़ें या सुनें। पूजा के अंत में माता गौरी और भगवान शिव की आरती करें। परिवार की सुख-शांति, पति की लंबी आयु और समृद्धि की कामना करते हुए प्रार्थना करें।

क्या कुंवारी लड़कियां भी रख सकती हैं मंगला गौरी व्रत?
धार्मिक परंपराओं में मंगला गौरी व्रत को विवाहित महिलाओं के साथ कुंवारी कन्याओं के लिए भी महत्वपूर्ण माना गया है। अविवाहित लड़कियां अच्छे जीवनसाथी और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना से माता गौरी की पूजा कर सकती हैं। हालांकि व्रत रखने की विधि परिवार और क्षेत्र की परंपरा के अनुसार अलग-अलग हो सकती है। इसलिए अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार पूजा करना उचित माना जाता है।
मंगला गौरी व्रत का धार्मिक महत्व
माता पार्वती को शक्ति, सौभाग्य और वैवाहिक सुख का प्रतीक माना जाता है। सावन के महीने में भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा का विशेष महत्व बताया गया है। इसी कारण सावन के मंगलवार को मंगला गौरी की पूजा करने की परंपरा चली आ रही है। मान्यता है कि श्रद्धा से व्रत और पूजा करने से परिवार में सुख-शांति आती है और दांपत्य जीवन में प्रेम और आपसी समझ मजबूत होती है। इस दिन महिलाएं माता गौरी से अपने परिवार के लिए मंगल और सुख की कामना करती हैं।

व्रत के दौरान स्वास्थ्य का भी रखें ध्यान
धार्मिक आस्था के साथ स्वास्थ्य का ध्यान रखना भी जरूरी है। यदि आप निर्जला या कठिन व्रत रख रही हैं और आपको कमजोरी, चक्कर, अत्यधिक थकान या किसी अन्य परेशानी का अनुभव हो तो अपनी स्वास्थ्य स्थिति को नजरअंदाज न करें। गर्भवती महिलाओं, स्तनपान कराने वाली महिलाओं, छोटे बच्चों, बुजुर्गों या किसी बीमारी से पीड़ित लोगों को उपवास रखने से पहले चिकित्सक की सलाह लेनी चाहिए। धार्मिक व्रत अपनी क्षमता और स्वास्थ्य को ध्यान में रखकर करना बेहतर है।
आज के दिन इन बातों का रखें ध्यान
मंगला गौरी व्रत के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और पूजा स्थल को साफ रखें। माता गौरी और भगवान शिव की श्रद्धापूर्वक पूजा करें। जरूरतमंदों की मदद करें और परिवार में शांति का माहौल बनाए रखें। वहीं क्रोध, विवाद, अपशब्द और नकारात्मक सोच से बचने का प्रयास करें। व्रत के नाम पर अपनी सेहत को नुकसान न पहुंचाएं और अपनी शारीरिक क्षमता के अनुसार ही उपवास करें।

सावन का तीसरा मंगला गौरी व्रत धार्मिक आस्था रखने वाली महिलाओं के लिए विशेष महत्व रखता है। इस दिन माता गौरी और भगवान शिव की पूजा, व्रत, कथा श्रवण और दान-पुण्य करने की परंपरा है। मान्यता है कि श्रद्धा और विश्वास के साथ माता की पूजा करने से वैवाहिक जीवन में सुख-शांति और परिवार में मंगल बना रहता है।
हालांकि अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में पूजा की विधि और व्रत के नियमों में अंतर हो सकता है। इसलिए अपने परिवार की परंपरा और स्थानीय पंचांग के अनुसार पूजा करना उचित रहेगा।
यह लेख धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं पर आधारित है। इसमें बताए गए उपायों और मान्यताओं को निश्चित परिणाम देने वाला नहीं माना जाना चाहिए। पूजा-पाठ और व्रत की विधि अलग-अलग स्थानों और परिवारों में अलग हो सकती है। व्रत रखने से पहले अपनी स्वास्थ्य स्थिति का ध्यान रखें और किसी बीमारी या विशेष स्वास्थ्य स्थिति में चिकित्सक की सलाह लें।
