By: Mala Mandal
देवघर। विश्व प्रसिद्ध बाबा बैद्यनाथ धाम में बांग्ला सावन की दूसरी सोमवारी के अवसर पर आस्था, श्रद्धा और परंपरा का अद्भुत संगम देखने को मिला। इस अवसर पर बाबा मंदिर प्रांगण स्थित विभिन्न मंदिरों में विभिन्न बेलपत्र समाजों की ओर से भव्य एवं आकर्षक बेलपत्र प्रदर्शनी का आयोजन किया गया। रंग-बिरंगे पुष्पों और कलात्मक शैली में सजाए गए बेलपत्रों ने श्रद्धालुओं का मन मोह लिया। सुबह से लेकर देर शाम तक मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी रही। स्थानीय लोगों के साथ-साथ देश के विभिन्न राज्यों से आए कांवरियों और शिवभक्तों ने प्रदर्शनी का अवलोकन कर बाबा बैद्यनाथ के जयकारे लगाए।

बेलपत्र प्रदर्शनी का आयोजन बाबा मंदिर परिसर स्थित लक्ष्मी नारायण मंदिर, काली मंदिर, मां तारा मंदिर, आनंद भैरव मंदिर तथा राम मंदिर सहित कई मंदिरों में किया गया। इन मंदिरों में चांदी के थालों में अत्यंत आकर्षक ढंग से बेलपत्रों को सजाया गया था। बेलपत्रों की कलात्मक प्रस्तुति और धार्मिक भावनाओं से ओत-प्रोत वातावरण ने श्रद्धालुओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। श्रद्धालु प्रदर्शनी के समक्ष रुककर भगवान शिव का स्मरण करते हुए जयकारे लगा रहे थे और बेलपत्र की महिमा का गुणगान कर रहे थे।

देर शाम विभिन्न बेलपत्र समाजों के सदस्यों ने सामूहिक रूप से बाबा बैद्यनाथ का विशेष पूजन किया और विधि-विधान के साथ बेलपत्र अर्पित किए। इस दौरान पूरे मंदिर परिसर में “बोल बम”, “हर-हर महादेव” और “जय बाबा बैद्यनाथ” के उद्घोष से वातावरण भक्तिमय बना रहा। श्रद्धालुओं ने भगवान शिव से परिवार की सुख-समृद्धि, स्वास्थ्य और मंगल की कामना की।

मनोकामना बेलपत्र समाज के संजय मठपती ने बताया कि बेलपत्र प्रदर्शनी की यह परंपरा बाबा बम-बम ब्रह्मचारी द्वारा प्रारंभ की गई थी। उनका उद्देश्य समाज को भगवान शिव की आराधना के माध्यम से एक सूत्र में बांधना था। उन्होंने बेलपत्र के आध्यात्मिक, औषधीय और धार्मिक महत्व को समझते हुए लोगों को इसके प्रति जागरूक किया। समाज के प्रत्येक वर्ग की सहभागिता सुनिश्चित करने के लिए उन्होंने दो अलग-अलग समूहों का गठन किया ताकि स्वस्थ प्रतिस्पर्धा के माध्यम से अधिक से अधिक लोग इस परंपरा से जुड़ें।
उन्होंने कहा कि वर्षों पहले शुरू की गई यह पहल आज विशाल जनआंदोलन का रूप ले चुकी है। वर्तमान समय में बच्चे, युवा और बुजुर्ग सभी बड़ी श्रद्धा और उत्साह के साथ जंगलों, पहाड़ों और नदी-नालों के दुर्गम क्षेत्रों से स्वयं बेलपत्र चुनकर लाते हैं। श्रावण संक्रांति से लेकर पूरे माह तक बेलपत्र प्रदर्शनी का आयोजन किया जाता है, जो श्रद्धालुओं के आकर्षण का प्रमुख केंद्र बनता है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान शिव की पूजा बेलपत्र के बिना अधूरी मानी जाती है। शास्त्रों में वर्णित मंत्र—
“त्रिदलं त्रिगुणाकारं त्रिनेत्रं च त्रिधायुतम्।
त्रिजन्मपापसंहारं बिल्वपत्रं शिवार्पणम्॥”
का उच्चारण करते हुए श्रद्धालु भगवान शिव को बेलपत्र अर्पित करते हैं। इसका अर्थ है कि तीन दलों वाला बेलपत्र भगवान शिव के तीन नेत्र, त्रिशूल और तीन गुणों का प्रतीक है तथा इसे अर्पित करने से तीन जन्मों के पापों का नाश होता है।

धार्मिक ग्रंथों में बेलपत्र के महत्व का विशेष उल्लेख मिलता है। स्कंद पुराण के अनुसार एक बार माता पार्वती ने अपने ललाट का पसीना पोंछकर मंदार पर्वत पर गिराया था। उसी पसीने की बूंदों से बेल वृक्ष की उत्पत्ति हुई। मान्यता है कि इस वृक्ष की जड़ों में मां गिरिजा, तने में मां महेश्वरी, शाखाओं में मां दक्षायनी, पत्तियों में मां पार्वती, पुष्पों में मां गौरी और फलों में मां कात्यायनी का वास होता है। इसलिए बेल वृक्ष और उसके पत्तों की पूजा अत्यंत शुभ मानी जाती है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जो श्रद्धालु बेल वृक्ष की पूजा करते हैं तथा उसके नीचे ब्राह्मणों को भोजन कराते हैं, उनकी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और जीवन में सुख, शांति एवं वैभव की प्राप्ति होती है। यही कारण है कि सावन महीने में बेलपत्र अर्पित करने का विशेष महत्व माना जाता है।
इस अवसर पर श्रीनाथ महाराज ने बताया कि समुद्र मंथन के दौरान निकले हलाहल विष का पान भगवान शिव ने समस्त सृष्टि की रक्षा के लिए किया था। विष के प्रभाव से उनके शरीर में अत्यधिक ताप उत्पन्न हो गया था। तब सभी देवी-देवताओं और दैत्यों ने भगवान शिव को गंगाजल अर्पित किया तथा बेलपत्र चढ़ाए, जिससे उनके शरीर की तपन शांत हुई। तभी से भगवान शिव को बेलपत्र अर्पित करने की परंपरा चली आ रही है और इसे अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है।

बांग्ला सावन की दूसरी सोमवारी पर आयोजित इस भव्य बेलपत्र प्रदर्शनी ने न केवल धार्मिक आस्था को नई ऊर्जा प्रदान की, बल्कि समाज को अपनी प्राचीन परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत से भी जोड़ने का कार्य किया। श्रद्धालुओं का मानना है कि बाबा बैद्यनाथ की कृपा से यह परंपरा आने वाली पीढ़ियों तक इसी प्रकार जीवंत बनी रहेगी और भगवान शिव के प्रति लोगों की आस्था निरंतर बढ़ती रहेगी। बाबा मंदिर परिसर पूरे दिन भक्ति, श्रद्धा और उत्साह के रंग में रंगा रहा।


