By: Mala Mandal
Jagannath Rath Yatra 2026: भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा भारत के सबसे भव्य और प्रसिद्ध धार्मिक उत्सवों में से एक मानी जाती है। हर वर्ष लाखों श्रद्धालु ओडिशा के पुरी में इस पावन यात्रा में शामिल होते हैं। वर्ष 2026 में भी जगन्नाथ रथ यात्रा को लेकर भक्तों में विशेष उत्साह देखने को मिल रहा है। इस यात्रा से जुड़ी कई अनोखी परंपराएं हैं, जिनमें सबसे विशेष है रथों के आगे मार्ग की सफाई के लिए सोने की झाड़ू का उपयोग। पहली नजर में यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान प्रतीत होता है, लेकिन इसके पीछे गहरे आध्यात्मिक और सांस्कृतिक संदेश छिपे हैं।

पुरी की रथ यात्रा में ओडिशा के गजपति महाराज स्वयं सोने की झाड़ू लेकर भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के रथों के मार्ग की सफाई करते हैं। इस परंपरा को ‘छेरा पहरा’ कहा जाता है। आइए जानते हैं कि इस परंपरा का क्या महत्व है और इसके पीछे कौन-से तीन बड़े कारण बताए जाते हैं।
1. भगवान के सामने सभी समान हैं
रथ यात्रा के दौरान राजा स्वयं सोने की झाड़ू लेकर मार्ग साफ करते हैं। इसका सबसे बड़ा संदेश यह है कि भगवान के सामने कोई बड़ा या छोटा नहीं होता। चाहे राजा हो या सामान्य व्यक्ति, सभी ईश्वर के भक्त हैं। यह परंपरा विनम्रता और समर्पण का प्रतीक मानी जाती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, जब गजपति महाराज स्वयं सफाई करते हैं तो वे यह संदेश देते हैं कि सत्ता, धन और पद से ऊपर भक्ति का स्थान है। यही कारण है कि इस अनुष्ठान को रथ यात्रा का अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।

2. मार्ग को पवित्र और शुभ बनाना
रथ यात्रा का मार्ग केवल एक सड़क नहीं माना जाता, बल्कि इसे भगवान के आगमन का पवित्र पथ माना जाता है। सोने की झाड़ू से की जाने वाली सफाई का उद्देश्य इस मार्ग को धार्मिक रूप से शुद्ध और शुभ बनाना है। मान्यता है कि भगवान जगन्नाथ स्वयं अपने भक्तों के बीच निकलते हैं, इसलिए उनके रथ के मार्ग को पूरी श्रद्धा और सम्मान के साथ तैयार किया जाता है। इस प्रक्रिया में सुगंधित जल और पवित्र पदार्थों का भी उपयोग किया जाता है, जिससे वातावरण में आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार माना जाता है
।
3. सेवा भाव का प्रतीक
छेरा पहरा केवल सफाई नहीं, बल्कि सेवा का प्रतीक है। हिंदू धर्म में सेवा को भक्ति का सर्वोच्च रूप माना गया है। जब राजा स्वयं झाड़ू लगाते हैं, तो यह दर्शाता है कि भगवान की सेवा करना सबसे बड़ा सौभाग्य है। यह परंपरा भक्तों को यह सीख भी देती है कि जीवन में सेवा, विनम्रता और कर्तव्य का भाव बनाए रखना चाहिए। धार्मिक विद्वानों के अनुसार, यही कारण है कि रथ यात्रा की यह परंपरा सदियों से चली आ रही है और आज भी उसी श्रद्धा के साथ निभाई जाती है।

सोने की झाड़ू का विशेष महत्व
सोना भारतीय संस्कृति में पवित्रता, समृद्धि और दिव्यता का प्रतीक माना जाता है। भगवान जगन्नाथ के रथ मार्ग की सफाई के लिए सोने की झाड़ू का उपयोग यह दर्शाता है कि यह कार्य अत्यंत सम्मान और श्रद्धा के साथ किया जा रहा है। हालांकि इसका उद्देश्य वैभव प्रदर्शन नहीं, बल्कि भगवान के प्रति सर्वोच्च सम्मान प्रकट करना है।

कब होती है यह रस्म?
रथ यात्रा शुरू होने से ठीक पहले गजपति महाराज छेरा पहरा की रस्म निभाते हैं। वे तीनों रथों के चारों ओर सोने की झाड़ू से सफाई करते हैं और पवित्र जल का छिड़काव करते हैं। इसके बाद ही रथों को आगे बढ़ाया जाता है। श्रद्धालु इस दृश्य को अत्यंत शुभ मानते हैं और इसे देखने के लिए बड़ी संख्या में एकत्र होते हैं।

जगन्नाथ रथ यात्रा में सोने की झाड़ू से मार्ग की सफाई केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि गहरा आध्यात्मिक संदेश देने वाला अनुष्ठान है। यह विनम्रता, समानता, पवित्रता और सेवा भाव का प्रतीक माना जाता है। राजा द्वारा स्वयं झाड़ू लगाना यह दर्शाता है कि भगवान के सामने सभी समान हैं और सच्ची भक्ति सेवा और समर्पण में ही निहित है। यही कारण है कि छेरा पहरा की यह परंपरा जगन्नाथ रथ यात्रा की सबसे अनोखी और महत्वपूर्ण रस्मों में गिनी जाती है।

यह लेख धार्मिक मान्यताओं, परंपराओं और उपलब्ध सांस्कृतिक जानकारी के आधार पर तैयार किया गया है। विभिन्न क्षेत्रों और परंपराओं में मान्यताओं में कुछ अंतर हो सकता है।


